Close the door when you leave,
place a barrier between our hearts.
This night
I shall be alone –
as the waning moon.
Close the door when you leave,
pull it tight
and turn the key.
I shall soon forget -
because you and I
were never meant to be.
3rd Edition of "मेरी आँखों में मुहब्बत के मंज़र हैं" is Running now.
कुछ इस तरह कागज पर मैंने अपने अलफ़ाज़ लिखे
दिल के टुकड़ों को जोड़कर अपने जज्बात लिखे......
मोल लगा मेरे अहसासों का, तेरे अहसानों का.......
कुछ बीक चुके हैं, कुछ अब भी हैं बिन बीके..........
मेरी कुछ प्रमुख रचनाएँ पढना चाहें तो यहाँ देखें
https://www.youtube.com/watch?v=m0bFMNHEq-4&feature=youtube_gdata
http://www.youtube.com/watch?v=K0BCckiTIVE&feature=relmfu
Book is available on.....
http://www.mysmartprice.com/books/msp_book_single.php?q=9789350830345
दिनेश गुप्ता 'दिन'
[https://www.facebook.com/dineshguptadin]
It never came as dancing flames
To set my heart on fire,
Nor did it come as stormy seas
That filled me with desire.
There was no pounding in my breast,
No tingling down my spine;
But just a sweet exchange of smiles,
Which told me you were mine.
Nor did the moon extend her glow
Upon your countenance -
No stars did ever light your eyes;
Enough that you should glance.
Such passion never touched my soul
That taunts the craving mind;
But just a tenderness within,
I deemed I’d never find.
You did not veil my eyes with mist,
Nor take my breath away.
Just sweet contentment stole my heart;
Now with you, I shall stay.
It came, a shimm’ring dust of gold
Upon my soul to fall -
Transported on a floating cloud,
Forever to enthral.
And now through life I’ll ever walk
With you here by my side -
Forever I will cherish you,
My love, and life-long guide.
पाने को आतुर रहतें हैं खोने को तैयार नहीं है
मुहँ मोड़ा जिम्मेदारी ने ,सुबिधाओं की जीत हो रही.
मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह श्रंगारिक नवगीत
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह श्रंगारिक नवगीत
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्..
यादों की
खंडहर
हवेली में
रहने को
कोई तो आये !
लीप पोत
आँगन
तुलसी के
चौंरे में
स्वस्तिका रचाये !
भीतर के फूले
पलाशों की
]छाँव तले
अनछुए प्रसंगों के
कोरे प्रस्तावों पर
रंगों से नाम लिखे,
दूध धुली ओंठों का
गूंगा आमंत्रण
पलकों की भाषा
नैनों की
इतर गंध
फूलों से प्रणय सिखे,
चिर परचित
रागिनी रसीली
जुही
गंध सी
सांस में समाये !
यादों की
खंडहर
हवेली में
रहने को
कोई तो आये !
लीप पोत
आँगन
तुलसी के
चौंरे में
स्वस्तिका रचाये !
होली के रंग सी
धुल गई
ओंठ की लिपस्टिक
बिन पूँछे आँखों का
पिया प्यार फूला है
भीतर गुलाब सा,
बरसों की
सूखी तलैया भी
देख रही
ख़बरों में मानसून
दरारों में लहराएगा
पानी तालाब सा,
हरी भरी
घाटियों के
पके बाल
लगते हैं
धूप के नहाये !
यादों की
खंडहर
हवेली में
रहने को
कोई तो आये !
लीप पोत
आँगन
तुलसी के
चौंरे में
स्वस्तिका रचाये !
मेड़ो के मंदिर में
झूम रहे
बरगद में
बाँधी थी हमने
कांपती उँगलियों से
मौली फूली डरैया,
मेलों के
शतरंगी सामियाने
उजड़ गये
और बदल गये चेहरे
दिखते नहीं
ठेलों में मूमफली लैया,
पतरोई सी
उड़ती
आँधियों की
आगी
आँख में समाये !
यादों की
खंडहर
हवेली में
रहने को
कोई तो आये !
लीप पोत
आँगन
तुलसी के
चौंरे में
स्वस्तिका रचाये !
भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह श्रंगारिक नवगीत
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्..
यादों की
खंडहर
हवेली में
रहने को
कोई तो आये !
लीप पोत
आँगन
तुलसी के
चौंरे में
स्वस्तिका रचाये !
भीतर के फूले
पलाशों की
]छाँव तले
अनछुए प्रसंगों के
कोरे प्रस्तावों पर
रंगों से नाम लिखे,
दूध धुली ओंठों का
गूंगा आमंत्रण
पलकों की भाषा
नैनों की
इतर गंध
फूलों से प्रणय सिखे,
चिर परचित
रागिनी रसीली
जुही
गंध सी
सांस में समाये !
यादों की
खंडहर
हवेली में
रहने को
कोई तो आये !
लीप पोत
आँगन
तुलसी के
चौंरे में
स्वस्तिका रचाये !
होली के रंग सी
धुल गई
ओंठ की लिपस्टिक
बिन पूँछे आँखों का
पिया प्यार फूला है
भीतर गुलाब सा,
बरसों की
सूखी तलैया भी
देख रही
ख़बरों में मानसून
दरारों में लहराएगा
पानी तालाब सा,
हरी भरी
घाटियों के
पके बाल
लगते हैं
धूप के नहाये !
यादों की
खंडहर
हवेली में
रहने को
कोई तो आये !
लीप पोत
आँगन
तुलसी के
चौंरे में
स्वस्तिका रचाये !
मेड़ो के मंदिर में
झूम रहे
बरगद में
बाँधी थी हमने
कांपती उँगलियों से
मौली फूली डरैया,
मेलों के
शतरंगी सामियाने
उजड़ गये
और बदल गये चेहरे
दिखते नहीं
ठेलों में मूमफली लैया,
पतरोई सी
उड़ती
आँधियों की
आगी
आँख में समाये !
यादों की
खंडहर
हवेली में
रहने को
कोई तो आये !
लीप पोत
आँगन
तुलसी के
चौंरे में
स्वस्तिका रचाये !
भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763
I sat beneath the Willow tree
And cried in sad lament -
The Willow wept because I wept;
Despaired and discontent
I lay upon the clovered grass
Enwrapped in fresh, sweet air -
The Willow wept, oh how she wept
To see me lying there
Her tears dripped down from branch and leaf
Then touched the moistened ground -
The Willow wept, because I wept
As there I sobbed and frowned
My love, my love has gone away
And never to return -
The Willow wept, oh how she wept;
With me, to ever yearn
She touched my face with gentle sway
Of boughs that bended low -
And then she wept, because I wept;
Why did you have to go ?
My love, my love has left me now
And I am so alone -
The Willow wept, oh how she wept;
Then watched me turn to stone
And now the clover ‘round me grows
Beneath the azure sky -
The Willow weeps, because I wept;
Forever here to lie
The sun shall burn upon this stone
Yet cold I’ll always stay -
The Willow weeps, oh how she weeps,
For here I lie today
ताई ताऊ , दादा दादी ,मौसा मौसी दूर हुएँ अब
हम दो और हमारे दो का ये कैसा परिवार हुआ.
रिश्तें नातें -प्यार की बातें , इनकी परबाह कौन करें
सब कुछ पैसा ले डूबा ,अब जाने क्या ब्यबहार हुआ ..
मेरे जिस टुकड़े को दो पल की दूरी बहुत सताती थी
जीवन के चौथेपन में अब ,बह सात समन्दर पार हुआ .
दिल में दर्द नहीं उठता है भूख गरीबी की बातों से
धर्म देखिये कर्म देखिये सब कुछ तो ब्यापार हुआ …
मेरे प्यारे गुलशन को न जानें किसकी नजर लगी है
युबा को अब काम नहीं है बचपन अब बीमार हुआ ….
जाने कैसे ट्रेन्ड हो गए मम्मी पापा फ्रेंड हो गए
शर्म हया और लाज ना जानें आज कहाँ दो चार हुआ …..
ताई ताऊ , दादा दादी ,मौसा मौसी दूर हुएँ अब
हम दो और हमारे दो का ये कैसा परिवार हुआ.
ग़ज़ल प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना
जिस टुकड़े को मेरे ,दो पल की दूरी बहुत सताती थी
जीवन के चौथेपन में अब ,बह सात समन्दर पार हुआ .
रिश्तें नातें -प्यार की बातें , इनकी परबाह कौन करें
सब कुछ पैसा ले डूबा अब जाने क्या ब्यबहार हुआ ..
दिल में दर्द नहीं उठता है भूख गरीबी की बातों से
धर्म देखिये कर्म देखिये सब कुछ तो ब्यापार हुआ ...
हुयी अपनों से अनबन है और गैरों से लगा मन है
अब मायूसी में युबा है और बचपन अब बीमार हुआ ....
जाने कैसे ट्रेन्ड हो गए मम्मी पापा फ्रेंड हो गए
शर्म हया और लाज ना जानें आज कहाँ दो चार हुआ .....
प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना
मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्ती करण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुशी हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर हैं .
पाले हैं
अंधे इरादे
थके नहीं
देव दानव
हिला नहीं पानी !
हारे न
मथते समुन्दर
सुन सुन
युगों से
परियों की थोथी कहानी !
रगड़ते सुमेरु से
टूटी रीढ़
छिली देह
देखे न कोई
वाशुकी की पीड़ा,
चीलों की आँख में
सागर की चट्टानें
दिखतीं
कुबेर का जखीडा,
तिलिस्मी
गुब्बार में
तितली के
पंखों सा
बिखरी है कबसे जवानी !
पाले हैं
अंधे इरादे
थके नहीं
देव दानव
हिला नहीं पानी !
हारे न
मथते समुन्दर
सुन सुन
युगों से
परियों की थोथी कहानी !
खौंद खौंद धरती पाताल
सब एक किया
और बने रहे
कातिक के भैंसा,
बुनते रहे
जालों पर जाले
गिरते रहे मकडजालों से
मकड़े के जैसा,
गा गा
कर लोरी
दे दे कर थपकी
नाती सुलाती
आँगन में नानी !
पाले हैं
अंधे इरादे
थके नहीं
देव दानव
हिला नहीं पानी !
हारे न
मथते समुन्दर
सुन सुन
युगों से
परियों की थोथी कहानी !
कोबरे गड़ैतों को
घेर घार
नेवलों ने
अपने मुंह पंजों से मारा,
शोक सभा तोड़ रही
बरगद की टहनी
दुबका है
खोखल में सारस बेचारा,
पोथी
पुराणों की
कामधेन
खींसा कचहरी में
सच सी हेरानी !
पाले हैं
अंधे इरादे
थके नहीं
देव दानव
हिला नहीं पानी !
हारे न
मथते समुन्दर
सुन सुन
युगों से
परियों की थोथी कहानी !
भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763
मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्ती करण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुशी हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर हैं .
पाले हैं
अंधे इरादे
थके नहीं
देव दानव
हिला नहीं पानी !
हारे न
मथते समुन्दर
सुन सुन
युगों से
परियों की थोथी कहानी !
रगड़ते सुमेरु से
टूटी रीढ़
छिली देह
देखे न कोई
वाशुकी की पीड़ा,
चीलों की आँख में
सागर की चट्टानें
दिखतीं
कुबेर का जखीडा,
तिलिस्मी
गुब्बार में
तितली के
पंखों सा
बिखरी है कबसे जवानी !
पाले हैं
अंधे इरादे
थके नहीं
देव दानव
हिला नहीं पानी !
हारे न
मथते समुन्दर
सुन सुन
युगों से
परियों की थोथी कहानी !
खौंद खौंद धरती पाताल
सब एक किया
और बने रहे
कातिक के भैंसा,
बुनते रहे
जालों पर जाले
गिरते रहे मकडजालों से
मकड़े के जैसा,
गा गा
कर लोरी
दे दे कर थपकी
नाती सुलाती
आँगन में नानी !
पाले हैं
अंधे इरादे
थके नहीं
देव दानव
हिला नहीं पानी !
हारे न
मथते समुन्दर
सुन सुन
युगों से
परियों की थोथी कहानी !
कोबरे गड़ैतों को
घेर घार
नेवलों ने
अपने मुंह पंजों से मारा,
शोक सभा तोड़ रही
बरगद की टहनी
दुबका है
खोखल में सारस बेचारा,
पोथी
पुराणों की
कामधेन
खींसा कचहरी में
सच सी हेरानी !
पाले हैं
अंधे इरादे
थके नहीं
देव दानव
हिला नहीं पानी !
हारे न
मथते समुन्दर
सुन सुन
युगों से
परियों की थोथी कहानी !
भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763
The sable sky devours the dying sun
Apollo sleeps, thus silent be his lyre,
So I shall sleep, for now the day is done
And shadows fall beneath the fading fire
As Luna softly smiles upon the night
Apollo sleeps, with laurel wreath adorned,
And darkness takes his place to steal my sight
The closing of the day forever mourned
For blinded thus, my soul no longer sings
(Apollo sleeps, the poet’s heart then stilled),
All thought has flown upon celestial wings
My heart no more to dance, no more fulfilled
Apollo sleeps, I pray that he shall wake -
My spirit, life, and soul, no more forsake
मिली दौलत ,मिली शोहरत,मिला है मान उसको क्यों
मौका जानकर अपनी जो बात बदल जाता है .
किसी का दर्द पाने की तमन्ना जब कभी उपजे
जीने का नजरिया फिर उसका बदल जाता है ..
चेहरे की हकीकत को समझ जाओ तो अच्छा है
तन्हाई के आलम में ये अक्सर बदल जाता है ...
किसको दोस्त माने हम और किसको गैर कह दें हम
जरुरत पर सभी का जब हुलिया बदल जाता है ....
दिल भी यार पागल है ना जाने दीन दुनिया को
किसी पत्थर की मूरत पर अक्सर मचल जाता है .....
क्या बताएं आपको हम अपने दिल की दास्ताँ
जितना दर्द मिलता है ये उतना संभल जाता है ......
ग़ज़ल:
मदन मोहन सक्सेना
I knew a song once,
a long time ago.
Such a lovely song -
about love, and hope, and trust.
The words echoed through my mind,
and the music,
the music captured my heart
and set me dancing with joy.
It was such a beautiful song -
about love, and hope, and trust.
Yes, I knew a song once,
but time has passed
and I no longer remember the words …
or the music.
It was dark,
I was immersed in a fluid world,
so small within its depths.
Beyond the boundary, muffled sounds
soft and tender, could be heard.
Sighs, laughter, and I longed to see from where they came,
yearning for sight to penetrate opaque lids.
But all that could be seen were shadows -
shadows, like phantoms drifting through a sea of calm.
In the distance could be heard a hypnotic tick tick tick,
marking time it seemed - my time, here, within.
But what of time:
was there a beginning, or an end ?
Suspended in peaceful unknowing,
I was rocked, by the gentle sway of my world,
into a silent slumber.
All was well in this universe,
where quiet waves licked against unseen shores.
But there was a storm unfolding .
A turbulence began to envelop me;
I was surrounded with its torment
- undulating, seizing, pushing -
and I felt the first pangs of fear
pulsating through my being.
Then, bewildered and disgruntled,
I emerged from the darkness,
kicking and screaming - into the light.
Can you remember your development from a single cell to your completion as a fully developed human being - no ?, then join me on my imaginary journey to find out ……..
BECOMING Part 1: Ovulation / Conception
I 'knew' nothing of my true beginnings - how could I, for I was a mystery, a mystery yet to be revealed. So where do I begin to tell the story of my existence. Many believe that my origin was set beyond this universe, in the wider cosmos which embraces all of creation, and that I was rooted in the stars, the stars being the source of the DNA that is at the very core of my being. I can now only speculate and consider that I had descended through the chaos generated at its inception, was then carried by the ether, and in the fullness of time, silently and in solitude, was laid in the cocoon in which I found myself. I was so very, very small - a microcosm within a larger world of which I was totally unaware.
My existence thus far had seemed so insignificant, and it felt as if I was in a state of suspended animation - waiting. I had been 'waiting' for such a very long time, it seemed, but I could not comprehend the reason for my waiting, if indeed there was a reason. But then, suddenly, and without warning, it happened - an explosion. It was an explosion which catapulted me out of my cocoon into what appeared to be the vastness of space, but which soon changed as it began to assume the likeness of a dark tunnel down which I was being propelled. Where I was going, I did not know. I had entered a new world, on another journey, but was unaware of my destination.
It was during this journey that something strange started to happen. I was not alone. There, in the darkness, I could sense a presence, a presence akin to a swirling mass, a flood or vortex which seemed to contain others like myself, yet not like myself. I was afraid, not knowing if they were benevolent beings or hostile entities, which were invading the new world in which I found myself. They 'swam' closer and closer until I was surrounded. My fear then became all-consuming, but it was temporary and would not last for long. At that moment, I started to tremble and then I felt myself spinning, round and round and round. I then realised that I was in the midst of this vortex, and it was the intruders who had initiated the spinning. It was not an unpleasant experience for it felt as though I was surrounded by soft feathers, feathers which were brushing past and around me, nudging me softly and tenderly, and almost lulling me into sleep.
मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्ती करण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुशी हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर हैं .
दूध धूली
पगड़ी के
पैंतरों से
बंधी रहीं
दीमक की
बड़ी बड़ी बामियाँ !
करती रहीं
खोखल
ताजो तख़्त
पलती रहीं
शाही
आस्तीनों में खामियाँ !
चाटुकार
चोरों ने
असली डकैतों को
पहना कर राजमुकुट
दे दी शिव संज्ञा,
भजन मुखी
ओंठों का
रक्त नहीं छूटा
बूचड परनाले सी
गंधाती गंगा,
कोल्हू
कोनैतों में
भैस बंधी
कांडी
कोदई सी
कूट रहीं सामियाँ !
दूध धूली
पगड़ी के
पैंतरों से
बंधी रहीं
दीमक की
बड़ी बड़ी बामियाँ !
करती रहीं
खोखल
ताजो तख़्त
पलती रहीं
शाही
आस्तीनों में खामियाँ !
ग्रहण लगा सूरज
क्षितिज छोड़
चाह रहा
नालों परनालों में
डूबकर नहाना,
खंती की
छोटी मछलियाँ
क्या जाने
बगुलों की आँखों का
शातिर निशाना,
प्राणभेदी
किरणों की
होती हैं
गुपचुप
भेडियों के
बीच में नीलामियाँ !
दूध धूली
पगड़ी के
पैंतरों से
बंधी रहीं
दीमक की
बड़ी बड़ी बामियाँ !
करती रहीं
खोखल
ताजो तख़्त
पलती रहीं
शाही
आस्तीनों में खामियाँ !
कोयले की खानों में
कितने
दधीचों ने
जनहित की खातिर
प्राण तजे अपने,
छूटा है
कोरों का काजल
आँखों में
आये नहीं
अभी तक शतरंगी सपने,
लिपी पुती
ऊपरी
अटारी से
गिरगिट सी
झाँक रहीं
लाल पीली नाकामियाँ !
दूध धूली
पगड़ी के
पैंतरों से
बंधी रहीं
दीमक की
बड़ी बड़ी बामियाँ !
करती रहीं
खोखल
ताजो तख़्त
पलती रहीं
शाही
आस्तीनों में खामियाँ !
भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्ती करण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुशी हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर हैं .
दूध धूली
पगड़ी के
पैंतरों से
बंधी रहीं
दीमक की
बड़ी बड़ी बामियाँ !
करती रहीं
खोखल
ताजो तख़्त
पलती रहीं
शाही
आस्तीनों में खामियाँ !
चाटुकार
चोरों ने
असली डकैतों को
पहना कर राजमुकुट
दे दी शिव संज्ञा,
भजन मुखी
ओंठों का
रक्त नहीं छूटा
बूचड परनाले सी
गंधाती गंगा,
कोल्हू
कोनैतों में
भैस बंधी
कांडी
कोदई सी
कूट रहीं सामियाँ !
दूध धूली
पगड़ी के
पैंतरों से
बंधी रहीं
दीमक की
बड़ी बड़ी बामियाँ !
करती रहीं
खोखल
ताजो तख़्त
पलती रहीं
शाही
आस्तीनों में खामियाँ !
ग्रहण लगा सूरज
क्षितिज छोड़
चाह रहा
नालों परनालों में
डूबकर नहाना,
खंती की
छोटी मछलियाँ
क्या जाने
बगुलों की आँखों का
शातिर निशाना,
प्राणभेदी
किरणों की
होती हैं
गुपचुप
भेडियों के
बीच में नीलामियाँ !
दूध धूली
पगड़ी के
पैंतरों से
बंधी रहीं
दीमक की
बड़ी बड़ी बामियाँ !
करती रहीं
खोखल
ताजो तख़्त
पलती रहीं
शाही
आस्तीनों में खामियाँ !
कोयले की खानों में
कितने
दधीचों ने
जनहित की खातिर
प्राण तजे अपने,
छूटा है
कोरों का काजल
आँखों में
आये नहीं
अभी तक शतरंगी सपने,
लिपी पुती
ऊपरी
अटारी से
गिरगिट सी
झाँक रहीं
लाल पीली नाकामियाँ !
दूध धूली
पगड़ी के
पैंतरों से
बंधी रहीं
दीमक की
बड़ी बड़ी बामियाँ !
करती रहीं
खोखल
ताजो तख़्त
पलती रहीं
शाही
आस्तीनों में खामियाँ !
भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763
For some time now,
I have been so down,
क्या कहूँ कि आज कल का ये समय कैसा तो है
आदमी खेलता है नफरतों से , दूर रहता प्यार से
नफरत से की गयी चोट का हर जख्म हमने सह लिया
घायल हुए उस रोज हम जिस रोज मारा प्यार से
प्यार के एहसास से जब जब रहे हम वेखबर
तब तब लगा हम को की हम जी रहे बेकार से
इजहार राज ए दिल का बह जिस रोज मिल करने लगे
उस रोज से हम पा रहे खुशबु भी देखो खार से
जालिम लगी दुनिया हमें हर शख्श बेगाना लगा
हर पल हमें धोखे मिले अपने ही ऐतबार से
ग़ज़ल :
मदन मोहन सक्सेना
No more, those blissful days
when we watched cotton candy trees blossom in the Spring,
listened to the trickle of silver streams
and the whisper of the wind through tall grasses.
All was well with the world
and life was full of promise.
But its an ill wind that blows now,
stirring my soul with bleak despair.
Everything comes to an end,
and I can see it in your eyes.
We are left with only an empty silence,
each with our own thoughts.
It’s the end of all things -
of all things that we once knew.
You are leaving ...
जालिम लगी दुनिया हमें हर शख्श बेगाना लगा
हर पल हमें धोखे मिले अपने ही ऐतबार से
नफरत से की गयी चोट का हर जख्म हमने सह लिया
घायल हुए उस रोज हम जिस रोज मारा प्यार से
प्यार के एहसास से जब जब रहे हम बेखवर
तब तब लगा हम को की हम जी रहे बेकार से
इजहार राज ए दिल का बह जिस रोज मिल करने लगे
उस रोज से हम पा रहे खुशबु भी देखो खार से
जब प्यार से इंकार हो तो इकरार से है बो भला
आने लगेगा तब मज़ा फिर इकरार का इंकार से
क्या कहूँ कि आज कल का ये समय कैसा तो है
आदमी ब्यापार से तो प्यार करता , दूर रहता प्यार से
ग़ज़ल :
मदन मोहन सक्सेना
जालिम लगी दुनिया हमें हर शख्श बेगाना लगा
बने रहें
दरबारी
O gentle as you please, my love,
I am yet still a maiden
And ‘though I yearn to know your will
My heart is heavy laden
For if I choose to lay with you
I deem that we should marry
As you would be the father of
The child that I may carry
I will not live a life of fear
Insulted and derided
And labelled as a worthless whore
Forevermore chastis’ed
So if you will not marry me
By you I’ll not be bedded
A maiden I shall stay, my love,
Until the day I’m wedded
मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
Lie with me
in a golden field of sun-ripened corn
beneath a beckoning sky
We shall listen to the gentle breeze
rising and falling, rising and falling
in sweet crescendos
synchronised with our love –
whispering, whispering
Lie with me
we shall seal our togetherness
with moistened lips
and eager breaths
before the falling of the sun
and the coming of the mellowing night
'मातृ दिवस ' पर अपनी प्रिय माँ का स्मरण करते हुए एवं सभी माओं को प्रणाम करते हुए -
माँ को जाना और, स्वयं मातृत्व में ढल के
प्रेम सुधा की वृष्टि मिली आँचल में पल के
रोम रोम है तरसता अब स्पर्श को उसके
हुई दूर , मैं ढूँढू तारों की चादर पर .....
............नीना शैल भटनागर