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Nov 07

ग़ज़ल (क्यों हर कोई परेशां है)

Madans Posted by: Madans in Uncategorized | Comments


ग़ज़ल (क्यों हर कोई परेशां है)

दिल के पास है लेकिन निगाहों से जो ओझल है
ख्बाबों में अक्सर वह हमारे पास आती है

अपनों संग समय गुजरे इससे बेहतर क्या होगा
कोई तन्हा रहना नहीं चाहें मजबूरी बनाती है

किसी के हाल पर यारों,कौन कब आसूँ बहाता है
बिना मेहनत के मंजिल कब किसके हाथ आती है

क्यों हर कोई परेशां है बगल बाले की किस्मत से
दशा कैसी भी अपनी हो किसको रास आती है

दिल की बात दिल में ही दफ़न कर लो तो अच्छा है
पत्थर दिल ज़माने में कहीं ये बात भाती है

भरोसा खुद पर करके जो समय की नब्ज़ को जानें
"मदन " हताशा और नाकामी उनसे दूर जाती है


प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना

Oct 17

दीपों का त्यौहार

Madans Posted by: Madans in हिंदी कविता | Comments

 
दीपों  का त्यौहार
मंगलमय हो आपको दीपों  का त्यौहार
जीवन में आती रहे पल पल नयी बहार
ईश्वर से हम कर रहे हर पल यही पुकार
लक्ष्मी की कृपा रहे भरा रहे घर द्वार..

मुझको जो भी मिलना हो ,बह तुमको ही मिले दौलत
तमन्ना मेरे दिल की है, सदा मिलती रहे शोहरत
सदा मिलती रहे शोहरत  ,रोशन नाम तेरा हो
ग़मों का न तो साया हो, निशा में न अँधेरा हो

दिवाली आज आयी है, जलाओ प्रेम के दीपक
जलाओ प्रेम के दीपक  ,अँधेरा दूर करना है
दिलों में जो अँधेरा है ,उसे हम दूर कर देंगें
मिटा कर के अंधेरों को, दिलों में प्रेम भर देंगें

मनाएं हम तरीकें से तो रोशन ये चमन होगा
सारी दुनियां से प्यारा और न्यारा  ये बतन होगा
धरा अपनी ,गगन अपना, जो बासी  बो भी अपने हैं
हकीकत में बे बदलेंगें ,दिलों में जो भी सपने हैं


मदन मोहन सक्सेना

Oct 16

दीवाली , उदासी और मैं

Madans Posted by: Madans in हिंदी कविता | Comments
Tagged in: Untagged 


दीवाली , उदासी और मैं

बह हमसे बोले हँसकर कि आज है दीवाली
उदास क्यों है दीखता क्यों बजा रहा नहीं ताली
मैं कैसें उनसे बोलूँ  कि जेब मेरी ख़ाली
जब हाथ भी बंधें हो कैसें बजाऊँ ताली
बह  बोले मुस्कराके धन से क्यों न खेलते तुम
देखो तो मेरी ओर दुखों को क्यों झेलते तुम
इन्सान कर्म पूजा सब को धन से ही तोलते हम
जिसके ना पास दौलत उससे न बोलते हम
मैंने जो देखा उनको खड़ें बह  मुस्करा रहे थे
दीवाली के दिन तो बह दौलत लुटा रहे थे
मैनें कहा ,सच्चाई मेरी पूजा इंसानियत से नाता
तुम जो कुछ भी कह रहे हो ,नहीं है मुझको भाता
वह   बोले हमसे हसकर ,कहता हूँ बह  तुम सुन लो
दुनियां में मिलता सब कुछ खुशियों से दामन भर लो
बातों में है क्या रक्खा मौके पे बात बदल लो
पैसों कि खातिर दुनियां में सब से तुम सौदा कर लो
वह  बोले हमसे हंसकर ,हकीकत भी तो यही है
इंसानों क़ी है दुनिया पर इंसानियत नहीं है
तुमको लगेगा ऐसा कि सब आपस में मिले हैं
पर ये न दिख सकेगा दिल में शिक्बे और गिले हैं
मैनें जो उनसे कहा क्या ,क्या कह जा रहे हैं
जो कुछ भी तुमने बोला ना हम समझ पा रहे हैं
मेरी नजर से देखो दुनियाँ  में प्यार ही मिलेगा
दौलत का नशा झूठा पल भर में ये छटेगा
दौलत है आनी जानी ये तो तो सब ही जानतें हैं
ये प्यार भरी दुनियां बस हम प्यार मानतें है
प्रेम के दीपक, तुम जब हर दिल में जलाओगे
सुख शांति समृधि की सच्ची दौलत तुम पाओगे
वह  बात सुन कर बोले ,यहाँ हर रोज है दीवाली
इन्सान की इस दुनियां का बस इश्वर है माली
बह  मुस्करा के बोले अब हम तो समझ गएँ हैं
प्रेम के दीपक भी मेरे दिल में जल गए हैं

प्रस्तुति :
मदन मोहन सक्सेना 

Oct 12

Alas my rose

sabitince Posted by: sabitince in General | Comments
Tagged in: writer , turkiye , turkish , turkey , sabitince , sabit ince , sabit , poet , poems , nevsehir , music , kozakli , kayseri , ince

Alas my rose 
 
Stole my youth years
I love the hands were
Happened to me does not smell roses
Alas Alas rose my rose 
I do not know my carpet what happens when
 
I've been nomadic cranes
I had ants on the road
I remember one dear
Alas Alas rose rose
Did not hurt me cruel...
 
Weird strange world
I got called in Konya
Shabby wrote my tag
Oh, my dear rose rose
Was not keep my hands, slice..
 
İnce waist, did not hold
friend not formed into the hands of
I do not get Muradiye
Rose Alas, alas rose
My arm was broken wings..

sabit ince Kayseri 05/10/2012 

Oct 09

वक़्त ऐसे ही अपना ना जाया करो

Madans Posted by: Madans in शायरी | Comments

वक़्त ऐसे ही अपना ना जाया करो

दूर रह कर हमेशा हुए फासले ,चाहें रिश्तें कितने क़रीबी क्यों ना हों
कर लिए बहुत काम लेन देन के ,विन मतलब कभी तो जाया करो

पद पैसे की इच्छा बुरी तो नहीं मार डालो जमीर कहाँ ये सही
जैसा देखेंगे बच्चे वही सीखेंगें ,पैर अपने माँ बाप के भी दबाया करो

काला कौआ भी है काली कोयल भी है ,कोयल सभी को भाती क्यों है
सुकूँ दे चैन दे दिल को ,अपने मुहँ में ऐसे ही अल्फ़ाज़ लाया करो

जब सँघर्ष है तब ही मँजिल मिले ,सब कुछ सुबिधा नहीं यार जीबन में है
जिस गली जिस शहर में चला सीखना , दर्द उसके मिटाने भी जाया करो

यार जो भी करो तुम सँभल करो , सर उठे गर्व से ना झुके शर्म से
वक़्त रुकता है किसके लिए ये “मदन” वक़्त ऐसे ही अपना ना जाया करो

ग़ज़ल:
मदन मोहन सक्सेना

Oct 06

They Soon Forget

Valerie Dohren Posted by: Valerie Dohren in English Poems | Comments
Tagged in: Untagged 

 

They soon forget and turn away,
for them, their days remain –
each day is just another day
and passes all the same.

They soon forget – the steady pulse
of life beats on and on -
the sun shines bright upon their time;
for others, it has gone.

For those with sorrow in their soul
the hurt continues long -
resounding in their broken hearts,
Gorecki’s mournful song.

They soon forget, they soon forget,
their memory grown pale –
the world for them keeps turning round
within their holy grail.

The steady pulse of life beats on,



















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Oct 06

Sealed

Valerie Dohren Posted by: Valerie Dohren in English Poems | Comments
Tagged in: Untagged 

 

Don’t break the seal upon my lips,
I won’t reveal my mind -
The dreams I hold within my heart
Will there remain confined.

No words shall now betray my thoughts,
I will not set them loose,
For silence has subdued my voice -
Of words, I have no use.

There’s a silence









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Sep 26

World of my imagination

Akanksha Pandey Posted by: Akanksha Pandey in English Poems | Comments
Tagged in: Untagged 

World of my imagination

Here everyone can run and walk,
here is no restriction on play and talk
Here we can do what we want,
no one is here to stop us whether she is mom or aunt.
Here children are the president and the king,
here everyone can buy everything.
Here we can freely move around,
Whether on the clouds or on the ground
Here everyone can make cartoons and animations,
and this will be world of my imagination.
Sep 22

Hold Me Tender

Valerie Dohren Posted by: Valerie Dohren in English Poems | Comments
Tagged in: Untagged 

 

Hold me tender as I slumber
Stay beside me while I sleep
Be forever in my dreaming
Keep me close lest I should weep

Soothe my anguish in the morning
Ease my heart from noontime care
Then as twilight grows upon me
Promise that you’ll still be there

So remain before the darkness
Touches all this troubled mind
Linger in the night’s cold shadows
All my heartache to unbind

Hold me tender as I slumber
Rescue me from solitude
Stay with me until the morning
When the day be then renewed

Sep 17

ठीक उसी तरह जैसे

Madans Posted by: Madans in हिंदी कविता | Comments
Tagged in: Untagged 

अपने अनुभबों,एहसासों ,बिचारों को
यथार्थ रूप में
अभिब्यक्त करने के लिए
जब जब मैनें लेखनी का कागज से स्पर्श किया
उस समय मुझे एक बिचित्र प्रकार के
समर से आमुख होने का अबसर मिला
लेखनी अपनी परम्परा प्रतिष्टा मर्यादा के लिए प्रतिबद्ध थी
जबकि मैं यथार्थ चित्रण के लिए बाध्य था
इन दोनों के बीच कागज मूक दर्शक सा था
ठीक उसी तरह जैसे
आजाद भारत की इस जमीन पर
रहनुमाओं तथा अन्तराष्ट्रीय बित्तीय संस्थाओं के बीच हुए
जायज और दोष पूर्ण अनुबंध को
अबाम को मानना अनिबार्य सा है
जब जब लेखनी के साथ समझौता किया
हकीकत के साथ साथ कल्पित बिचारों को न्योता दिया
सत्य से अलग हटकर लिखना चाहा
उसे पढने बालों ने खूब सराहा
ठीक उसी तरह जैसे
बेतन ब्रद्धि के बिधेयक को पारित करबाने में
बिरोधी पछ के साथ साथ सत्ता पछ के राजनीतिज्ञों
का बराबर का योगदान रहता है
आज मेरी प्रत्येक रचना
बास्तबिकता से कोसों दूर
कल्पिन्कता का राग अलापती हुयी
आधारहीन तथ्यों पर आधारित
कृतिमता के आबरण में लिपटी हुयी
निरर्थक बिचारों से परिपूरण है
फिर भी मुझको आशा रहती है कि
पढने बालों को ये
रुचिकर सरस ज्ञानर्धक लगेगी
ठीक उसी तरह जैसे
हमारे रहनुमा बिना किसी सार्थक प्रयास के
जटिलतम समस्याओं का समाधान
प्राप्त होने कि आशा
आये दिन करते रहतें हैं
अब प्रत्येक रचना को लिखने के बाद
जब जब पढने का अबसर मिलता है
तो लगता है कि
ये लिखा मेरा नहीं है
मुझे जान पड़ता है कि
मेरे खिलाफ
ये सब कागज और लेखनी कि
सुनियोजित साजिश का हिस्सा है
इस लेखांश में मेरा तो नगण्य हिस्सा है
मेरे हर पल कि बिबश्ता का किस्सा है
ठीक उसी तरह जैसे
भेद भाब पूर्ण किये गए फैसलों
दोषपूर्ण नीतियों के दुष्परिणम आने पर
उसका श्रेय
कुशल राजनेता पूर्ब बरती सरकारों को दे कर के
अपने कर्तब्यों कि इतिश्री कर लेते हैं


मदन मोहन सक्सेना

Sep 05

शिक्षा ,शिक्षक और हम

Madans Posted by: Madans in Uncategorized | Comments


 

शिक्षा ,शिक्षक और हम

आज शिक्षक दिवस है
यानि
भारत के पूर्व राष्ट्रपति और दार्शनिक तथा शिक्षाविद डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन
प्रश्न है कि आज शिक्षक दिबस की कितनी जरुरत है
शिक्षक लोग आज के दिन
बच्चों से मिले तोहफे से खुश हो जाते हैं
और बच्चे शिक्षक को खुश देख कर खुश हो जातें हैं
शिक्षा का मतलब सिर्फ जानकारी देना ही नहीं है
जानकारी और तकनीकी गुर का अपना महत्व है
लेकिन बौद्धिक झुकाव और लोकतांत्रिक भावना का भी महत्व है
इन भावनाओं के साथ छात्र उत्तरदायी नागरिक बनते हैं
जब तक शिक्षक ,शिक्षा के प्रति समर्पित और प्रतिबद्ध नहीं होगा
तब तक शिक्षा को अपना उद्देश्य नहीं मिल पायेगा
हमारी संस्कृति में
शिक्षक और गुरु का दर्जा तो भगवान से भी ऊपर माना गया है
लेकिन
आज का गुरु गुरु कहलाने लायक है इस पर प्रश्नचिह्न हैं
कितने ही गुरु ऐसे हैं जिन पर घिनौने अपराधों के आरोप लगे हुए हैं
शिक्षक भी गुरु के पद से तो उतर ही चुका है
अब वह शिक्षक भी रह पाएगा इसमें संदेह है
परिणाम ये हुआ है कि
आज न तो छात्रों के लिए कोई शिक्षक
उनका आर्दश , उनका मार्गदर्शक गुरू और जीवनभर की प्रेरणा बन पाता है
और न ही शिक्षक बनने को उत्सुक भी हैं
बही घिसी पिटी शिक्षा प्रणाली को उम्र भर खुद ढोता है
और छात्रों की पीठ पर लादता हुआ
एक शिक्षक
अब इस आस में कभी नहीं रहता कि उसका कोई छात्र
देश और समाज के निर्माण में कोई बडी सकारात्मक  भूमिका निभाएगा
सवाल ये कि इन सब के लिए कौन जिम्मेदार है
शिक्षक , शिक्षा ब्यबस्था या समाज
शिक्षक को जिस सम्मान से देखा जाना चाहियें
जो सुबिधाएं शिक्षक को  मिलनी चाहियें ,क्या मिल रहीं हैं
अगर नहीं
तो आज के भौतिक बादी युग में कौन शिक्षक बनना चाहेंगा
यदि शिक्षक संतुष्ट नहीं रहेगा
तो हमारे बच्चों का भबिष्य क्या होगा
देश सेबा में उनका कितना योगदान होगा
और हम किस दिशा में जा रहें हैं
समझना ज्यादा मुश्किल नहीं हैं।

शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामना :




प्रस्तुति :
मदन मोहन सक्सेना

Sep 04

ग़ज़ल(दूसरो का किस तरह नुकसान हो )

Madans Posted by: Madans in शायरी | Comments
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ग़ज़ल(दूसरो का किस तरह नुकसान हो )

ख्बाब था मेहनत के बल पर , हम बदल डालेंगे किस्मत
ख्बाब केवल ख्बाब बनकर, अब हमारे रह गए हैं



कामचोरी , धूर्तता, चमचागिरी का अब चलन है
बेअरथ से लगने लगे है ,युग पुरुष जो कह गए हैं





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Aug 30

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Aug 30

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kajla100 Posted by: kajla100 in Business | Comments

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Aug 27

ग़ज़ल(इश्क क्या है)

Madans Posted by: Madans in शायरी | Comments
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ग़ज़ल(इश्क क्या है)
हर सुबह रंगीन अपनी शाम हर मदहोश है
वक़्त की रंगीनियों का चल रहा है सिलसिला


चार पल की जिंदगी में ,मिल गयी सदियों की दौलत
जब मिल गयी नजरें हमारी ,दिल से दिल अपना मिला



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Aug 19

मिलने का चलन यारों ना जानें कब से गुम अब है

Madans Posted by: Madans in हिंदी कविता | Comments
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कंक्रीटों के जंगल में नहीं लगता है मन अपना
जमीं भी हो गगन भी हो ऐसा घर बनातें हैं

ना ही रोशनी आये ,ना खुशबु ही बिखर पाये
हालत देखकर घर की पक्षी भी लजातें हैं

दीबारें ही दीवारें नजर आये घरों में क्यों
पड़ोसी से मिले नजरें तो कैसे मुहँ बनाते हैं

मिलने का चलन यारों ना जानें कब से गुम अब है
टी बी और नेट से ही समय अपना बिताते हैं

ना दिल में ही जगह यारों ना घर में ही जगह यारों
भूले से भी मेहमाँ को नहीं घर में टिकाते हैं

अब सन्नाटे के घेरे में ,जरुरत भर ही आबाजें
घर में ,दिल की बात दिल में ही यारों अब दबातें हैं


मदन मोहन सक्सेना

Aug 14

Darkling Eyes

Valerie Dohren Posted by: Valerie Dohren in English Poems | Comments
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What moves behind those darkling eyes
What memories concealed -
What shadows drift within their gaze
What visions unrevealed

If I could reach into your mind
All hidden thoughts to know
What phantoms would I find therein
What dreams would inside flow

For as I look upon those eyes
I see a secret world
A world that you alone shall keep
To never be unfurled

The stories that you hold within
Are yours forevermore
To carry with you through all time
Within your mem’ry store

So when I see a wistful smile
Or catch a teardrop fall
I know that you’re remembering
All that you would recall

Perhaps a mother’s gentle kiss
Perhaps her warm embrace
Or maybe it’s a sadder song
Reflected on your face

If only you would beckon me
Behind those darkling eyes
That I might join my soul with yours
Before the sunlight dies

Aug 14

जय हिंदी जय हिंदुस्तान मेरा भारत बने महान

Madans Posted by: Madans in हिंदी कविता | Comments
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जय हिंदी जय हिंदुस्तान मेरा भारत बने महान

गंगा यमुना सी नदियाँ हैं जो देश का मन बढ़ाती हैं
सीता सावित्री सी देवी जो आज भी पूजी जाती हैं

यहाँ जाति धर्म का भेद नहीं सब मिलजुल करके रहतें हैं
गाँधी सुभाष टैगोर तिलक नेहरु का भारत कहतें हैं

यहाँ नाम का कोई जिक्र नहीं बस काम ही देखा जाता है
जिसने जब कोई काम किया बह ही सम्मान पाता है

जब भी कोई मिले आकर बो गले लगायें जातें हैं
जन आन मान की बात बने तो शीश कटाए जातें हैं

आजाद भगत बिस्मिल रोशन बीरों की ये तो जननी है
प्रण पला जिसका इन सबने बह पूरी हमको करनी है

मथुरा हो या काशी हो चाहें अजमेर हो या अमृतसर
सब जातें प्रेम भाब से हैं झुक जातें हैं सबके ही सर.

प्रस्तुति: मदन मोहन सक्सेना

Aug 11

I rather have you

eyebello Posted by: eyebello in English Poems | Comments
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So long as you exist,

So my heart keeps beating,

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Aug 10

THE MIND WE SHARE

eyebello Posted by: eyebello in English Poems | Comments
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For the first time in forever,

I found a like mind friend,

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Aug 10

The unknown feelings

eyebello Posted by: eyebello in English Poems | Comments
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Once upon a time,

The beginning of all stories,

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Aug 10

The love I wished I had

eyebello Posted by: eyebello in Uncategorized | Comments
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In the middle of the night,

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Aug 07

बात-बात पर अवरोध,क्योकि हम स्वतंत्र हैं। एम.के.पाण्डेय “निल्को”

vmwteam Posted by: vmwteam in लेख | विचार | Comments
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बात-बात पर अवरोध,क्योकि हम स्वतंत्र हैं। एम.के.पाण्डेय “निल्को”

 

नगर निगम ने कई दिनों से मोहल्लों का कचड़ा नहीं उठाया,लोगो ने रोड जाम कर दिया। गुस्सा बहुत था,इसलिए वाहनो पर पथराव किया गया । स्कूल मे मिड डे मील नहीं बना, छोटे बच्चों को लेकर अभिभावक सड़क पर आ गये । परिवहन विभाग के बसों के शीशे तोड़ दिये। शहर मे शोहदों ने किसी से छेड़खानी की। किसी शरीफ से नहीं देखा गया , वह मना करने लगा तो विवाद हो गया । विवाद बढ़ा तो बात चक्काजाम पर आ गई। सिटी मजिस्ट्रेट ने समझाबुझा कर जाम समाप्त कराया । महाविद्यालय मे एडमिशन नहीं तो जाम ....... । बात-बात पर अवरोध, क्योकि हम स्वतंत्र हैं। हालत यह है की –
कुछ घरों मे मुश्किल है
सुबह-शाम चूल्हे जलाना,
बड़ा आसान हो गया है
बात-बात पर बस्ती जलाना।
      सामान्‍य रूप में आजादी का अर्थ पूर्ण तौर पर स्‍वतंत्र होना है , जिसमें किसी का भी कोई हस्‍तक्षेप न हो। पर मनुष्‍य के जीवन में वैसी आजादी किसी काम की नहीं , क्‍यूंकि इसमें उसके समुचित विकास की कोई संभावना नहीं बनती।  लेकिन आज स्वतंत्रता का मतलब बदल गया है। हम स्वच्छंद होते जा रहे है। 15 अगस्त 1947 से आज तक की राष्ट्रीय यात्रा का विश्लेषण करे तो बहुत कुछ अपेक्षित नहीं दिखाई दे रहा है। यहा अंग्रेज़ नहीं है,न उनकी व्यवस्था है। सब कुछ हमारा है, लेकिन हम संतुष्ट नहीं है। सत्ता के स्तर पर सबसे पहले तो केंद्र और राज्य सरकारें ही स्वतंत्र नहीं हैं। आज सब गोलमाल हो गया है। राज्य सरकारे उन मामलों में भी केंद्र पर निर्भर हैं, जिनमें उन्हें स्वतंत्र होना चाहिए। शरीर से हम भारतीय, दिल और दिमाग से पश्चिमी धारा के गुलाम हो गए। यह सब आज हमारे खान-पान,रीति-रिवाज़,बोल-चाल तथा पहनावे में साफ दिख रहा है। हमारे स्वतंत्र व्यवहार के कारण चहुंओर क्या दीख रहा है? अपने घर से ही शुरुआत करें? पढ़ाई-लिखाई के कारण आत्मनिर्भरता आती है, आर्थिक उन्नति होती है। पर इस आत्मनिर्भरता ने व्यक्ति को स्वच्छंद बना दिया है। स्वच्छंदता स्वतंत्रता नहीं है।  स्वच्छंदता का आलम यह है कि देश की सामूहिक स्वतंत्रता को ध्वस्त करने के लिए न जाने कितने आतंकी, अलगाववादी और विध्वसंक संगठन खड़े हो गए। इन संगठनों के कारण समाज जितना तबाह हो रहा है, शायद साम्राच्यवाद के समय भी न हुआ हो।
      अंग्रेज़ो को केवल गालिया देकर स्वतंत्रा की जयकार करने से पहले यदि अपने आस-पास के पुलो,भवनो पर नज़र दौड़ाए, तो देखते है की इतने सालो पहले की बनी इमारत खड़ी होकर इठला रही है और जिस भवन, पुल को आज़ाद भारत के कमीशनबाज नेताओ,ठेकेदारो ने बनवाया है वह धराशायी हो गए । जबसे देश आजाद हुआ है हमने केवल अपने बारे में सोचा है. मेरा भारत महान कहने वाले कई लोग मिल जाते है पर उसमे उनका क्या योगदान है ये वो नहीं बता पाते. मानो उनके यहाँ पैदा होने से ही ये देश महान हुआ हो. इस देश के लिए जो लोग कुर्बान हो गए उनके सपनो के भारत को हमने कही खो दिया है।  स्वतंत्रा के मतलब इतना बदल गए हैं कि किसी कवि कि यह लाइन बहुत ही सटीक बैठ रही है –
देखता हूं चलन सियासत का,
हर कहीं बैर के बवंडर हैं।
फर्क ऊंचाइयों मे है लेकिन,
नीचता मे सभी बराबर हैं।
      बहुत दुःख का विषय है कि स्वराज्य-प्राप्ति के इतने वर्षों बाद भी सामाजिक और राजनैतिक हालत इतने अधिक चिंताजनक हैं। समाज में स्वार्थ लगातार बढ़ रहा है। अपराध की घटनाओं में वृद्धि हो रही है। आतंकवाद, नक्सलवाद, विदेशी घुसपैठ इत्यादि खतरे देश को चारों ओर से घेर रहे हैं। देश के किसी न किसी भाग से प्रतिदिन किसी आतंकवादी घटना,नक्सली हमले या किसी बम विस्फोट का समाचार अवश्य मिलता है और ऐसे कठिन समय में सरे मत-भेद भुलाकर एक होने और इन हमलावरों को कुचलने कि बजाय हम भाषावाद, प्रांतवाद और मजहबी उन्माद से ग्रस्त होकर आपस में ही लड़ रहे हैं। या तो हमें सत्य दिखाई नहीं देता, या हम देखना ही नहीं चाहते। किसी को केवल अपनी जाति की चिंता है और कोई राष्ट्र की बजाय केवल किसी समुदाय-विशेष के हित को ही प्राथमिकता देता है।  जिस देश में युवावस्था का अर्थ बल, बुद्धि एवं विद्या होना चाहिए, वहाँ अधिकांश युवा इसके विपरीत धूम्रपान, मद्यपान और ड्रग्स जैसे नशीले पदार्थों की चपेट में हैं। उनके जीवन में संयम, धैर्य तथा शान्ति का स्थान स्वच्छंदता, उन्मुक्त जीवन शैली तथा विवेकहीन उन्माद ने ले लिया है। अधिकांश युवाओं को क्रांतिकारियों की कम और क्रिकेट की जानकारी अधिक है। विदेशी वस्तुओं तथा विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर, खादी को प्रतीक बनाकर स्वदेशी के प्रयोग का संदेश देने वाले महात्मा गाँधी के देश में आज कोने कोने तक विदेशी वस्तुओं के विक्रेता पुनः पहुँच गए हैं। जिस देश में कभी 'जय जवान-जय किसान' का मंत्र गूंजता था, वहाँ शासन की नीतियों से व्यथित होकर शहीद सैनिकों के परिजन सरकार को सभी पदक लौटा रहे हैं और किसान प्रतिदिन आत्महत्या कर रहे हैं। सोने की चिडिया कहलने वाला देश छोटे-छोटे कार्यों में आर्थिक सहायता के लिए कभी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, तो कभी विश्व बैंक की और देखता है। हमारी आर्थिक नीतियों से आज भी भारत की बजाय बाहरी देशों को ही अधिक लाभ हो रहा है। ऐसी स्थिति में हम कैसे कह सकते हैं की हम स्वतंत्र हैं?
      आज यह आवश्यक है कि देश आत्मविश्लेषण करे। देश, राज्य और व्यक्ति को स्वतंत्र बनाया जाए स्वच्छंद नहीं। सर्वधर्म समभाव, सर्वे भवंतु सुखिन: और तेन त्यक्तेन भुंजीथ: जैसे संबल हमारे पास हैं। अंत कि चार लाइनों को भी ध्यान से पढ़ कर आप अपने सुझाव या शिकायत लिखने के लिए स्वतंत्र है ।
हम तो स्वतंत्र होते हुए भी परतंत्र हैं
यहाँ ना खुशियाँ हैं, ना खिलखिलाहट
यहाँ तो चलता है बस आतंकवादी तंत्र
यह कैसा प्रजातंत्र है, यह कैसा लोकतंत्र
कोई हमें बतलाये तो
क्या यही स्वतंत्र है?
******************************
 एम.के.पाण्डेय “निल्को”
+91-9024589902
Aug 05

Lead Me Into Light

Valerie Dohren Posted by: Valerie Dohren in English Poems | Comments
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O take my heart and lead me into light
For darkness overwhelms my soul tonight -
Such melancholy steals the brightling day
So chasing all that glistens far away

The love that has now gone will ne’er return
O’er this my mind, my soul, shall ever yearn -
Must I, with longing, live a joyless life
That cuts into me as a murd’rous knife

So lost am I in bitter-sweet recall
That into bleak despondency I fall -
His voice shall never speak again my name
For now he sleeps, no more a flick’ring flame

I am but now a feather in the wind
(A captured, dried, poor butterfly unpinned)
Yet tracing circles in the silvered sky
No place to rest, no earth on which to lie 

















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Aug 05

Inside Of You

Valerie Dohren Posted by: Valerie Dohren in English Poems | Comments
Tagged in: Untagged 

 

Let me dwell inside of you
for just a little while
Feel your heartbeat softly pulse
and linger in your smile

There to share each breath you take
each movement of your eye
Mingle with your burning blood
each teardrop as you cry

Taking every step with you
whispering through your voice
So together bound in love
O how we would rejoice

You and I could move the world
if we were joined as one
Hold the stars within our hands
and reach out for the sun

Let me dwell inside of you
my spirit there sustain
Be the guardian of my soul
that I might live again






















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Jul 30

lotus greens gurgaon

homeresidency Posted by: homeresidency in Uncategorized | Comments
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Jul 26

दुश्मन आज सारे जाने पहचाने लगते हैं

Madans Posted by: Madans in हिंदी कविता | Comments
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दुश्मन आज सारे जाने पहचाने लगते हैं

 

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Jul 25

Solid Ground

Valerie Dohren Posted by: Valerie Dohren in English Poems | Comments
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I built my house on solid ground
Convinced that it was safe and sound
Not thinking that the earth could move
But earthquakes happen just to prove
No ground can ever be secure -
My house fell down and is no more.

Beneath the surface, nothing’s fixed
As with the rocks our fate is mixed
And everything can surely break -
There’s nothing that the earth can’t shake
No walls forever stay erect
And all that’s joined can disconnect

Jul 25

क्राँति शब्द

Preet Butter Posted by: Preet Butter in हिंदी कविता | Comments
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थके हुए शब्दोँ से क्राँति नहीँ होगी,
तोडने होँगे परंपरागत शब्दोँ के अर्थ
देने होँगे पुराने शब्दोँ को नवीन ज्वलंत अर्थ
फिर गढनी होगी
नई परिभाषाएँ
थके हुए,लङखङाते,सहमेँ हुए शब्द 
अव्यवस्था को क्राँति के नाम पर देते हैँ सबल।
सदियोँ से चले आ रहे शब्द
शनै:शनै: हो गये हैँ वृत्ताकार
अब इनसे कही,कोई चोट नहीँ पहुँचती
और ये लुढकते चले जा रहे हैँ।
क्राँति हेतु अनिवार्यता है
शब्द ऐसे हो
जो नश्तर बन ह्रदय मेँ पैवश्त हो,
अशुद्ध रक्त को बाहर निकाल
कर दे सम्पूर्ण व्यवस्था का विरेचन।

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