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May 17

The infrangible feelings

eyebello Posted by: eyebello in English Poems | Comments
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For some time now,

I have been so down,

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May 16

ग़ज़ल

Madans Posted by: Madans in हिंदी कविता | Comments
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क्या कहूँ कि आज कल का ये समय कैसा तो है
आदमी खेलता है नफरतों से , दूर रहता प्यार से

नफरत से की गयी चोट का हर जख्म हमने सह लिया
घायल हुए उस रोज हम जिस रोज मारा प्यार से

प्यार के एहसास से जब जब रहे हम वेखबर तब तब लगा हम को की हम जी रहे बेकार से

इजहार राज ए दिल का बह जिस रोज मिल करने लगे
उस रोज से हम पा रहे खुशबु भी देखो खार से

जालिम लगी दुनिया हमें हर शख्श बेगाना लगा
हर पल हमें धोखे मिले अपने ही ऐतबार से



ग़ज़ल :
मदन मोहन सक्सेना

May 16

Cotton Candy Trees

Valerie Dohren Posted by: Valerie Dohren in English Poems | Comments
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               No more, those blissful days
when we watched cotton candy trees blossom in the Spring,
listened to the trickle of silver streams
and the whisper of the wind through tall grasses.

All was well with the world
and life was full of promise.

But its an ill wind that blows now,
stirring my soul with bleak despair.
Everything comes to an end,
and I can see it in your eyes.

We are left with only an empty silence,
each with our own thoughts.

It’s the end of all things -
of all things that we once knew.

You are leaving ...

 


















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May 15

बडबोलिये----नवगीत

Bholanath Posted by: Bholanath in Uncategorized | Comments
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मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्ती करण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुशी हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर हैं ...
बडबोलिये अंधों को गूंगों ने सौंपे हैं राज मुकुट बहरों को दे दीं तलवारें ! कसाइयों के बूचड में जलसा सजे हैं बकरा बली के राँपियों की आरती उतारें ! घर की दहलीजों की अंतहीन शरहद न जाने भेड़ियों का आँगन में करते हैं स्वागत कंधे उचका कर, ह्वेनसांग लिखने को आतुर हैं फिर से
सीमाओं के शिलालेख लद्दाखी घाटियों में आँखें दिखाकर, शरहद के सूरवीर शेरों की खातिर भेजी हैं राजा ने पन्नी में चूड़ी सलवारें !
बडबोलिये अंधों को गूंगों ने सौंपे हैं राज मुकुट बहरों को दे दीं तलवारें ! कसाइयों के बूचड में जलसा सजे हैं बकरा बली के राँपियों की आरती उतारें ! मुर्गों के पखनों में बाँध बाँध छुरियाँ लड़ायेंगे जगह जगह भीड़ मजमा लगायेंगे पिट्ठू दरवारी, चन्दन और तुलसी के चौरों को अपने ही हाथों से लीपेंगे गंधाते खच्चर के गोबर से बारी बारी, उतनेगे खोंपा खपरैले फ़ोड़ेंगे माटी के चूल्हे तोड़ेंगे ठाठ और म्यारें !
बडबोलिये अंधों को गूंगों ने सौंपे हैं राज मुकुट बहरों को दे दीं तलवारें ! कसाइयों के बूचड में जलसा सजे हैं बकरा बली के राँपियों की आरती उतारें ! नाचेंगे छाती में पीपर देवारी मूँडों में बाँध बाँध मोर पंख और मबरी की फूली डरईया, मादर की थापों में झंमका के छाहुर बांहों दुबका के दुधपीमा बछिया बिचकायेंगे खेरका की गईया, शाह नहीं मस्जिद के शाही इमामों की बांछें लेकर तलवारें कलम को ललकारें ! बडबोलिये अंधों को गूंगों ने सौंपे हैं राज मुकुट बहरों को दे दीं तलवारें ! कसाइयों के बूचड में जलसा सजे हैं बकरा बली के राँपियों की आरती उतारें ! भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763
May 15

बडबोलिए -----नवगीत

Bholanath Posted by: Bholanath in Uncategorized | Comments
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मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्ती करण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुशी हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर हैं ...
बडबोलिये अंधों को गूंगों ने सौंपे हैं राज मुकुट बहरों को दे दीं तलवारें ! कसाइयों के बूचड में जलसा सजे हैं बकरा बली के राँपियों की आरती उतारें ! घर की दहलीजों की अंतहीन शरहद न जाने भेड़ियों का आँगन में करते हैं स्वागत कंधे उचका कर, ह्वेनसांग लिखने को आतुर हैं फिर से
सीमाओं के शिलालेख लद्दाखी घाटियों में आँखें दिखाकर, शरहद के सूरवीर शेरों की खातिर भेजी हैं राजा ने पन्नी में चूड़ी सलवारें !
बडबोलिये अंधों को गूंगों ने सौंपे हैं राज मुकुट बहरों को दे दीं तलवारें ! कसाइयों के बूचड में जलसा सजे हैं बकरा बली के राँपियों की आरती उतारें ! मुर्गों के पखनों में बाँध बाँध छुरियाँ लड़ायेंगे जगह जगह भीड़ मजमा लगायेंगे पिट्ठू दरवारी, चन्दन और तुलसी के चौरों को अपने ही हाथों से लीपेंगे गंधाते खच्चर के गोबर से बारी बारी, उतनेगे खोंपा खपरैले फ़ोड़ेंगे माटी के चूल्हे तोड़ेंगे ठाठ और म्यारें !
बडबोलिये अंधों को गूंगों ने सौंपे हैं राज मुकुट बहरों को दे दीं तलवारें ! कसाइयों के बूचड में जलसा सजे हैं बकरा बली के राँपियों की आरती उतारें ! नाचेंगे छाती में पीपर देवारी मूँडों में बाँध बाँध मोर पंख और मबरी की फूली डरईया, मादर की थापों में झंमका के छाहुर बांहों दुबका के दुधपीमा बछिया बिचकायेंगे खेरका की गईया, शाह नहीं मस्जिद के शाही इमामों की बांछें लेकर तलवारें कलम को ललकारें ! बडबोलिये अंधों को गूंगों ने सौंपे हैं राज मुकुट बहरों को दे दीं तलवारें ! कसाइयों के बूचड में जलसा सजे हैं बकरा बली के राँपियों की आरती उतारें ! भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

May 15

ग़ज़ल (ऐतबार)

Madans Posted by: Madans in शायरी | Comments
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जालिम लगी दुनिया हमें हर शख्श  बेगाना लगा
हर पल हमें धोखे मिले अपने ही ऐतबार से

नफरत से की गयी चोट का हर जख्म हमने सह लिया
घायल हुए उस रोज हम जिस रोज मारा प्यार से

प्यार के एहसास  से जब जब रहे हम बेखवर तब तब लगा हम को की हम जी रहे बेकार से

इजहार राज ए  दिल का बह जिस रोज मिल करने लगे
उस रोज से हम पा रहे खुशबु भी देखो खार से

जब प्यार से इंकार हो तो इकरार से है बो भला
आने लगेगा तब मज़ा फिर  इकरार का इंकार से

क्या कहूँ कि आज कल का ये समय कैसा तो है
आदमी ब्यापार से तो प्यार करता , दूर रहता प्यार से

ग़ज़ल :
मदन मोहन सक्सेना

May 14

ग़ज़ल

Madans Posted by: Madans in शायरी | Comments
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जालिम लगी दुनिया हमें हर शख्श बेगाना लगा

हर पल हमें धोखे मिले अपने ही ऐतबार से


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May 13

विराजें वहीँ आप ----नवगीत

Bholanath Posted by: Bholanath in Uncategorized | Comments
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विराजें वहीँ आप
इंद्र की सभा में

बने रहें

दरबारी

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May 13

A Maiden's Plea

Valerie Dohren Posted by: Valerie Dohren in English Poems | Comments
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O gentle as you please, my love,
I am yet still a maiden
And ‘though I yearn to know your will
My heart is heavy laden

For if I choose to lay with you
I deem that we should marry
As you would be the father of
The child that I may carry

I will not live a life of fear
Insulted and derided
And labelled as a worthless whore
Forevermore chastis’ed

So if you will not marry me
By you I’ll not be bedded
A maiden I shall stay, my love,
Until the day I’m wedded

May 12

बदल गईं कई कई सदियाँ --नवगीत

Bholanath Posted by: Bholanath in Uncategorized | Comments
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मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !

साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

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May 12

Lie With Me

Valerie Dohren Posted by: Valerie Dohren in English Poems | Comments
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                 Lie with me
in a golden field of sun-ripened corn
beneath a beckoning sky

We shall listen to the gentle breeze
rising and falling, rising and falling
in sweet crescendos
synchronised with our love –

whispering, whispering

Lie with me
we shall seal our togetherness
with moistened lips
and eager breaths

before the falling of the sun
and the coming of the mellowing  night

May 12

माँ

Neena shail Bhatnagar Posted by: Neena shail Bhatnagar in Uncategorized | Comments
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'मातृ दिवस ' पर अपनी प्रिय माँ का स्मरण करते हुए एवं सभी माओं को प्रणाम करते हुए -





माँ को जाना और, स्वयं मातृत्व में ढल के 
प्रेम सुधा की वृष्टि मिली आँचल में पल के 
रोम रोम है तरसता अब स्पर्श को उसके 
हुई दूर , मैं ढूँढू तारों की चादर पर .....

............नीना शैल भटनागर

May 11

अंतहीन शब्दों का जाल है ---नवगीत

Bholanath Posted by: Bholanath in Uncategorized | Comments
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मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्ती करण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुशी हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर हैं ...
अंतहीन शब्दों का जाल है शीशे में बिम्ब का अकाल है प्रतीकों को ग्रहण लगा शिल्पों में टूट रहीं छेनियाँ घिसे पिटे कत्थ्यों का अनुभव पहार है ! नाम नवगीत पर जो टिके हैं कौड़ियों के दाम पर बिके हैं लगता कहीं समाधान ठगा गाँव गली कांदो की गेडियाँ गीतों में केवल किताबी लंजार है ! रंगे चंगे पिपर ठूँठों को दे दी डकैतों ने बरगद की शंज्ञा बजाकर नगाड़े, उंगली के अभिनय में नाच रहीं कठपुतली भौंचक हैं देख कर व्यास के अखाड़े, श्रद्धा हीन नीम की निमौरियाँ खुजलाती आँख की बिरौनियाँ कर्पूर नकुओं में ऊगा
जूड़े में बेले की वेणियाँ
मछली के जबड़ों में नदिया उधार है !
अंतहीन शब्दों का जाल है शीशे में बिम्ब का अकाल है प्रतीकों को ग्रहण लगा शिल्पों में टूट रहीं छेनियाँ घिसे पिटे कत्थ्यों का अनुभव पहार है ! नाम नवगीत पर जो टिके हैं कौड़ियों के दाम पर बिके हैं लगता कहीं समाधान ठगा गाँव गली कांदो की गेडियाँ गीतों में केवल किताबी लंजार है ! लगातार दिशा हीन
दौड़ जारी है लौटे दिन घूरों के ऊगे हैं झरबेरी जरबे, मछुओं के जाल फंसी जलपरियाँ खींच तान खरियों से हीचीं
टूटे हैं मुरबे, दूध धुले कंठों के गीत गये पनघट सोहर सगुन घट रीत गये सरफूंदी का याद है दगा झूठी रस्म हैं ओंठ पनबिरियाँ पतरोई पतझर का फैला अम्बार है !
अंतहीन शब्दों का जाल है शीशे में बिम्ब का अकाल है प्रतीकों को ग्रहण लगा शिल्पों में टूट रहीं छेनियाँ घिसे पिटे कत्थ्यों का अनुभव पहार है ! नाम नवगीत पर जो टिके हैं कौड़ियों के दाम पर बिके हैं लगता कहीं समाधान ठगा गाँव गली कांदो की गेडियाँ गीतों में केवल किताबी लंजार है ! इंद्रधनुषी जिल्दों के भीतर गुणवत्ता दिखे नहीं पसरा है केवल खाली सन्नाटा,
ओढ़ कर विज्ञापित शालें मासूम आँतों को पेटों के पनपे दांतों ने काटा,
प्राणों सधी हैं गुलेलें बाँहें उँगली से खेलें कोयल लुकी है मूद कर रगा देखती रही हैं आँख हेड़ियाँ
गुब्बार उठता रहा कारवां बिमार है !
अंतहीन शब्दों का जाल है शीशे में बिम्ब का अकाल है प्रतीकों को ग्रहण लगा शिल्पों में टूट रहीं छेनियाँ घिसे पिटे कत्थ्यों का अनुभव पहार है ! नाम नवगीत पर जो टिके हैं कौड़ियों के दाम पर बिके हैं लगता कहीं समाधान ठगा गाँव गली कांदो की गेडियाँ गीतों में केवल किताबी लंजार है ! भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
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May 11

अंतहीन शब्दों का जाल है ---नवगीत

Bholanath Posted by: Bholanath in Uncategorized | Comments
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मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्ती करण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुशी हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर हैं ...
अंतहीन शब्दों का जाल है शीशे में बिम्ब का अकाल है प्रतीकों को ग्रहण लगा शिल्पों में टूट रहीं छेनियाँ घिसे पिटे कत्थ्यों का अनुभव पहार है ! नाम नवगीत पर जो टिके हैं कौड़ियों के दाम पर बिके हैं लगता कहीं समाधान ठगा गाँव गली कांदो की गेडियाँ गीतों में केवल किताबी लंजार है ! रंगे चंगे पिपर ठूँठों को दे दी डकैतों ने बरगद की शंज्ञा बजाकर नगाड़े, उंगली के अभिनय में नाच रहीं कठपुतली भौंचक हैं देख कर व्यास के अखाड़े, श्रद्धा हीन नीम की निमौरियाँ खुजलाती आँख की बिरौनियाँ कर्पूर नकुओं में ऊगा
जूड़े में बेले की वेणियाँ
मछली के जबड़ों में नदिया उधार है !
अंतहीन शब्दों का जाल है शीशे में बिम्ब का अकाल है प्रतीकों को ग्रहण लगा शिल्पों में टूट रहीं छेनियाँ घिसे पिटे कत्थ्यों का अनुभव पहार है ! नाम नवगीत पर जो टिके हैं कौड़ियों के दाम पर बिके हैं लगता कहीं समाधान ठगा गाँव गली कांदो की गेडियाँ गीतों में केवल किताबी लंजार है ! लगातार दिशा हीन
दौड़ जारी है लौटे दिन घूरों के ऊगे हैं झरबेरी जरबे, मछुओं के जाल फंसी जलपरियाँ खींच तान खरियों से हीचीं
टूटे हैं मुरबे, दूध धुले कंठों के गीत गये पनघट सोहर सगुन घट रीत गये सरफूंदी का याद है दगा झूठी रस्म हैं ओंठ पनबिरियाँ पतरोई पतझर का फैला अम्बार है !
अंतहीन शब्दों का जाल है शीशे में बिम्ब का अकाल है प्रतीकों को ग्रहण लगा शिल्पों में टूट रहीं छेनियाँ घिसे पिटे कत्थ्यों का अनुभव पहार है ! नाम नवगीत पर जो टिके हैं कौड़ियों के दाम पर बिके हैं लगता कहीं समाधान ठगा गाँव गली कांदो की गेडियाँ गीतों में केवल किताबी लंजार है ! इंद्रधनुषी जिल्दों के भीतर गुणवत्ता दिखे नहीं पसरा है केवल खाली सन्नाटा,
ओढ़ कर विज्ञापित शालें मासूम आँतों को पेटों के पनपे दांतों ने काटा,
प्राणों सधी हैं गुलेलें बाँहें उँगली से खेलें कोयल लुकी है मूद कर रगा देखती रही हैं आँख हेड़ियाँ
गुब्बार उठता रहा कारवां बिमार है !
अंतहीन शब्दों का जाल है शीशे में बिम्ब का अकाल है प्रतीकों को ग्रहण लगा शिल्पों में टूट रहीं छेनियाँ घिसे पिटे कत्थ्यों का अनुभव पहार है ! नाम नवगीत पर जो टिके हैं कौड़ियों के दाम पर बिके हैं लगता कहीं समाधान ठगा गाँव गली कांदो की गेडियाँ गीतों में केवल किताबी लंजार है ! भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

May 10

पलकों की देहरी पर ---नवगीत

Bholanath Posted by: Bholanath in Uncategorized | Comments
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मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह श्रंगारिक  नवगीत

साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम  बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

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May 10

सरबजीत ने देश कि लाज रख ली

Dilip Posted by: Dilip in Uncategorized | Comments
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सरबजीत ने देश कि लाज रख ली ,
उसके दिल ,गुर्दे थे तो निकाल लिये ,
अगर किसी नेता के टटोलते तो ,
देश को शर्मसार होना पड़ता ,
न दिल, जिगर ना खोजने पर दिमाग,
का कही पता चलता .

May 10

ज़िंदा देश को ,मुर्दा कंधे चला रहे हैं

Dilip Posted by: Dilip in Uncategorized | Comments
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ज़िंदा देश को ,मुर्दा कंधे चला रहे हैं ,
चुप रहो ,
संसद को कब्रिस्तान बना रहे हैं

May 10

ग़ज़ल

Madans Posted by: Madans in शायरी | Comments
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दिल के पास हैं लेकिन निगाहों से बह ओझल हैं
क्यों असुओं से भिगोने का है खेल जिंदगी।

जिनके साथ रहना हैं ,नहीं मिलते क्यों दिल उनसे
खट्टी मीठी यादों को संजोने का है खेल जिंदगी।

किसी के खो गए अपने, किसी ने पा लिए सपनें
क्या पाने और खोने का है खेल जिंदगी।

उम्र बीती और ढोया है, सांसों के जनाजे को
जीवन सफर में हँसने रोने का है खेल जिंदगी।

किसी को मिल गयी दौलत, कोई तो पा गया शोहरत
मदन बोले , काटने और बोने का ये खेल जिंदगी।

















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May 09

अखबारों के बड़े हादसे ......नवगीत

Bholanath Posted by: Bholanath in Uncategorized | Comments
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मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम नवरात्रि की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...
अखबारों के बड़े हादसे शोर सराबा दहशत गर्दी पाल रही है बांह में वर्दी आने वाली सुबह की छाती होंगे बड़े बड़े विस्फोट ! महानगर की महा सभा के दरबारी हैं चोर उच्चके सभापति बीहड़ के पाले लील रहे दुधमुँही चेतना प्रतिबंधों की नातेदारी ओट ! नदिया किनारे बूढ़े कहुओं की पीठों से सधी कुल्हारी छील रही है ताज़ा ताज़ा छाल, बड़ी बड़ी नाँदों के भीतर पकेगी सड सड चमर ठिकाने धीरे धीरे मरी गाय की खाल, कई कई जन्मों की कल्पी अथक साधना चित्र केतु की समझ न आई चरर मरर कंठों भर सिसकी कदम कदम पर झेले पनही पानी पाथर चोट ! अखबारों के बड़े हादसे शोर सराबा दहशत गर्दी पाल रही है बांह में वर्दी आने वाली सुबह की छाती होंगे बड़े बड़े विस्फोट ! महानगर की महा सभा के दरबारी हैं चोर उच्चके सभापति बीहड़ के पाले लील रहे दुधमुँही चेतना प्रतिबंधों की नातेदारी ओट ! गांजा भांग धतूर अफीमी मदहोशी की गोली सी जहन भरी है जनम जनम की जहर गुलामी, दिनचर्या में देह खपी है देहरी देहरी तरुआ घिस गए कमर झुकी है टूटे हाथ सलामी, सूत्रधार चाणक्य चोटैया उगली आग बोर कर मिसरी सावन मास की अंधी आँखें कैसे जानें तपन जेठ की मरुथल मृग छलना की खोट ! अखबारों के बड़े हादसे शोर सराबा दहशत गर्दी पाल रही है बांह में वर्दी आने वाली सुबह की छाती होंगे बड़े बड़े विस्फोट ! महानगर की महा सभा के दरबारी हैं चोर उच्चके सभापति बीहड़ के पाले लील रहे दुधमुँही चेतना प्रतिबंधों की नातेदारी ओट ! मठाधीश हो गए कसाई आनन फानन छोड़ मढुलिया भैरों नाचें क्षेत्र पाल के द्वारे, भूत प्रेत बैताल के बंधुआ पंडे रहा कौन जो कला बताये देवी फिरें विपत के मारे,
छद्मीं उत्सव गाजे बाजे यज्ञ आहूती सन्यासी को चली लुभाने बहुरूपियों की फ़ौज ले ध्वजा नारियल लाल लंगोटी चिलम खेत की रोट ! अखबारों के बड़े हादसे शोर सराबा दहशत गर्दी पाल रही है बांह में वर्दी आने वाली सुबह की छाती होंगे बड़े बड़े विस्फोट ! महानगर की महा सभा के दरबारी हैं चोर उच्चके सभापति बीहड़ के पाले लील रहे दुधमुँही चेतना प्रतिबंधों की नातेदारी ओट !
भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763
May 08

Oblivion

Valerie Dohren Posted by: Valerie Dohren in English Poems | Comments
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               There is nothing left to say now.
Cherished dreams slip into nothingness
as they float away upon the sea of change
towards the far horizon, quietly surrendered,
beyond sight, beyond touch,
fading softly with the dying of the sun.

There is nothing left to say now.
Everything comes to an end,
and we all flounder in the darkness
like lost children with no hand to hold,
no place to go,
no new tomorrows.

There is nothing left to say now.
No more songs to sing, nor stories to tell,
no dawns, no sunsets in this new time,
as the light is forever extinguished,
and naught else remains
but oblivion …..

May 07

मुट्ठी में मैल नहीं ------नवगीत

Bholanath Posted by: Bholanath in Uncategorized | Comments
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मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम नवरात्रि की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...
मुट्ठी में मैल नहीं सूखी तलैया सा सूखा है ओंठों का थूंक
आँखों में ऊगा नकुओं में महका भमरों का चूसा गुलाब ! चंपा चमेली हांथों की खेली मेहदी रची है गीतों की दिल में अमुआं की डारी गाये कोयलिया
बसवट में अरझी है कोरी किताब ! बेरहमी लू में सूरज की किरणे आगी उलीचें सिसकती हवा छांह बरगद निहारें, नभ छूते बादल को भेजा है न्योता वरुण ने चुँधियाया झाँक रहा पोखर दरारें, आँतों की पत्थरी पेटों को पची नहीं नुस्खे न जाने मूरख अनाड़ी
घिस घिस पिया खूब घुमची का करु करु काढ़ा बाहर न आया जुलाब ! मुट्ठी में मैल नहीं सूखी तलैया सा सूखा है ओंठों का थूंक
आँखों में ऊगा नकुओं में महका भमरों का चूसा गुलाब ! चंपा चमेली हांथों की खेली मेहदी रची है गीतों की दिल में अमुआं की डारी गाये कोयलिया
बसवट में अरझी है कोरी किताब !
भीड़ भगदड़ में टूटे घुटने पसुरियों की पीड़ा हंडिया के अदहन सी आँखों में छलकी, मर्माहत अंतहीन हादसों की खबरें कुर्बानी कदम कदम लगती कसइयों को हलकी,
मुस्कानें मंहगी मुंह में सकेले झूमे न घूमे नाचे न गाये
भीड़ भट्ठी हंसें न ठिठोली सतरंगी बोतल भरे है भीतर शराब ! मुट्ठी में मैल नहीं सूखी तलैया सा सूखा है ओंठों का थूंक
आँखों में ऊगा नकुओं में महका भमरों का चूसा गुलाब ! चंपा चमेली हांथों की खेली मेहदी रची है गीतों की दिल में अमुआं की डारी गाये कोयलिया
बसवट में अरझी है कोरी किताब !
कौन सिये पुस्तैनी चीथड़े हवाओं में उड़ते पूंछें शिलालेख इतिहासी तहसील से,
दूध भरी नदिया की धारा जरीबों ने सोखा सोने की चिड़िया क्यों लटकी है कील से, जारी खबर हैं कहते हैं सेमल की शाखों के बगुले धूल चांट जीवित है गैया
खिरका की गूंगी मौन हैं बरेदी कौन दे जबाब ! मुट्ठी में मैल नहीं सूखी तलैया सा सूखा है ओंठों का थूंक
आँखों में ऊगा नकुओं में महका भमरों का चूसा गुलाब ! चंपा चमेली हांथों की खेली मेहदी रची है गीतों की दिल में अमुआं की डारी गाये कोयलिया
बसवट में अरझी है कोरी किताब !
भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763
May 07

ग़ज़ल

Madans Posted by: Madans in शायरी | Comments
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May 06

चार दशकों से ----नवगीत

Bholanath Posted by: Bholanath in Uncategorized | Comments
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मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम नवरात्रि की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...
चार दशकों से देखा है व्यास हुए
बिना कविता मुए !  गीत लिखकर मनीषी कब्रों में कितना निरास हुए ! देखता हूँ आड़ी तिरछी पन्नों की थूहर,  कविता नहीं होती हैं कवियों के मुंह पर,
कई कई बार  लोग बाग़ फिर भी
फूले वन पलाश हुए !
चार दशकों से देखा है व्यास हुए
बिना कविता मुए !  गीत लिखकर मनीषी कब्रों में कितना निरास हुए ! कहना मुह आई खरी खरी आस नहीं करना,
घटिया तुक बंदियों के घाट कभी मत ठहरना, धोबी के गदहे हैं घोड़े नहीं देखे बेरास हुए !.
चार दशकों से देखा है व्यास हुए
बिना कविता मुए !  गीत लिखकर मनीषी कब्रों में कितना निरास हुए ! जाल पुरे शब्दों  के धनुष नहीं फेंकना,   लौटेंगे घायल रथी फिर  शिविरों से देखना,
शब्द भेदी वांणों के तूणींर   कबके खलाश हुए ! चार दशकों से देखा है व्यास हुए
बिना कविता मुए !  गीत लिखकर मनीषी कब्रों में कितना निरास हुए ! रेंगेंगे कितना बैसाखियों के  लंगड़े, उलझेंगे अरझेंगे जालियों में मकड़े, दूध धुली ओंठों के गीत मधुर झूले तलाश हुए !
चार दशकों से देखा है व्यास हुए
बिना कविता मुए !  गीत लिखकर मनीषी कब्रों में कितना निरास हुए ! भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

May 06

फिर एक घोटाला अब की बारी आयी रेल की

Madans Posted by: Madans in लेख | विचार | Comments
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फिर एक घोटाला
अब की बारी आयी रेल की पहले टू जी फिर कॉमन वेल्थ  फिर कोयला उसके बाद अंतरिक्ष और आज फिर एक घोटाला फिर एक बार मीडिया में शोर फिर एक बार नेताओं की तू तू मैं मैं फिर एक बार सरकार की जाँच की बात फिर एक बार जाँच के बहाने  घोटाले को दबाने की साजिश फिर एक बार समिति का गठन फिर एक बार जनहित याचिका की उम्मीद फिर एक बार उच्चत्तम न्यायालय से  अपेछा फिर एक बार जनता का बुदबुदाना कि जाने दो सब एक जैसे हैं।
किन्तु ऐसा कह कर हम अपनी जिम्मेदारी से बिमुख नहीं हो सकते  अब समय आ गया कि हम सब अपने  स्तर से लोगों को आगाह करें कि भ्रष्टाचार करना जितना बड़ा जुर्म है उसे सहना और भ्रष्टाचार देखकर  चुपचाप रहना  भी कम बड़ा जुर्म नहीं है.
प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना 
 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 



मदन मोहन सक्सेना .

May 05

कौन .........नवगीत

Bholanath Posted by: Bholanath in Uncategorized | Comments
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मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम नवरात्रि की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...

कौन घिस घिस कसेगा कसौटियों में  
और फिर तरासेगा भारत की मूरत वही !  
खंडित मुकुट है घायल है गौरव गिद्धों ने खाई सोने की चिड़िया समझ कर दही !
भोगी नहीं है मुह की आजादी कानों सुनी है देह दिखती उतारी अंग्रेजों की वर्दी,  
काढ़ा करू वैद्य लगते हैं जाहिल अंग्रेजी गोली बिन हटती नहीं है नकुओं की शर्दी, रेढ़ों की देवदारु पचगुरिया की बौलें
नीमों की झौंडी गिलोय न रही !
कौन घिस घिस कसेगा कसौटियों में  
और फिर तरासेगा भारत की मूरत वही !  
खंडित मुकुट है घायल है गौरव गिद्धों ने खाई सोने की चिड़िया समझ कर दही !
देशी चिरैया अंग्रेजी बोली छलती हैं छद्मी मुस्काने चारा जुटाती चुनगुन को तौलें,  
खा खा कर अपने ही खेतों की उमदा फसलें उपजाऊ धरती को बंजर बनाने की कौलें,  
वैतरणी बोली चौकड़ियाँ भरती आँगन की बछिया नरदों में प्यासी बही !
कौन घिस घिस कसेगा कसौटियों में  
और फिर तरासेगा भारत की मूरत वही !  
खंडित मुकुट है घायल है गौरव गिद्धों ने खाई सोने की चिड़िया समझ कर दही !
तिरंगा फहराता कुकुर बिलियाँ राजा किले पर पगड़ी को भूला बिसरा है ओंठों की बोली,  
राधा की आबरू रौंद रहीं सिओलानें  
हिजड़ों के आगे खोल रहीं छतियों की चोली,
मोहन की मुरली बजाये बंदरिया पाँव पगहा में बांधे नचाये मन की कही ! कौन घिस घिस कसेगा कसौटियों में  
और फिर तरासेगा भारत की मूरत वही !  
खंडित मुकुट है घायल है गौरव गिद्धों ने खाई सोने की चिड़िया समझ कर दही !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

May 05

dosti..

Dr.Sweet Angel Posted by: Dr.Sweet Angel in शायरी | Comments
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दोस्ती रूह,दोस्ती  खुदा और  इश्क  की शुरुवात  है 

दोस्ती मंदिर  ,मस्जिद और मुहब्बत  का आगाज़ है 

May 05

पर हृदय में एकांत कितना ..............

Dr.Sweet Angel Posted by: Dr.Sweet Angel in हिंदी कविता | Comments
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अभी तक जी रही थी 
सिर्फ एक एकांत 
घर में  बहुत भीड़ है 
पर मन में है एकांत 
इस एकांत को तोड़ने 
अभी तक न कोई आया था 
खलबली तो मचा  गए सभी
 अपने .........???????
कभी तानो की 
कभी अपमान की 
कभी तिरस्कार की 
कभी प्रताड़ना  की 
कभी मेरे कर्तव्यों की 
ये करो, ये न करो 
ऐसे  करो ,वैसे करो 
मुह मत खोलो 
किसी से मत बोलो 
अधिकारों की बात ही मत करो 
बस कर्तव्य  ही निभाते जाओ 
चारों  ओर  शोर इतना 
पर हृदय में  एकांत कितना 
................................
पर ऐसे  में आपका आना 
आप में देखा 
एक सरल भाव 
एक अपनापन 
आपने बताया तो जाना 
हाय ......................
मैं भी एक इन्सान हूँ 
इच्छाएं मेरी भी हैं ....
हाँ ...........
ये सलोनी खिलखिलाहट 
ये आशा-उमंग मेरे मन में  भी हैं 
रे पागल मन 
तू भी गाता  है…. 
पैर तेरे भी हैं 
जो थिरकना चाहते हैं 
तन तेरा भी चाहता है झूमना 
शायद किसी के आलिंगन में 
या शायद किसी के मद भरे  गीतों में ....
बिखरे  हुए मोतियों की 
माला को गूंथने का एक साहस 
एक हौंसला ,एक सहारा 
एक एहसास ,एक साथी 
एक सरल व्यक्तित्व 
आश्चर्य-जनक ,प्रतिभाशाली 
स्वंत्र-विचारों का सहायक 
कोई  अपनों से अधिक  अपना ........
............पर पराया .....
Dr.Sweet Angel

May 04

अंगारों पर खून पसीना --- नवगीत

Bholanath Posted by: Bholanath in Uncategorized | Comments
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मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम नवरात्रि की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...
अंगारों पर खून पसीना मेहनत सूद उजाड़ जिंदगी सुने न अमुआं छाँह गिलहरी ! कन्धों गिरगिट अस्तीनों के विषधर अमरबेल सेनापति सींचें तुलसी खड़ी कचहरी ! हाँथ कंगाली पिसवन पानी चढ़ी त्योरियां सूखी ओठें दबी बीड़ियाँ, ढली देह खांसी का सागर नीम नसीहत कान न भाये मधु मक्खी मरी सीढियां, खूंटे घाँस अकारथ हो गई लहटी गईया गोलैंदा खाये महुआ पाँल्हर ठहरी !
अंगारों पर खून पसीना मेहनत सूद उजाड़ जिंदगी सुने न अमुआं छाँह गिलहरी ! कन्धों गिरगिट अस्तीनों के विषधर अमरबेल सेनापति सींचें तुलसी खड़ी कचहरी ! बिगड़ी बीन बजाये कैसे पहचाने न सांप संपेरिन भरे पिंटारा साजिस, छोड़ हवा सूरज सोया
जली झोपडी राख है ठंडी
बंसवट बांटे माचिस,
पंजों में आकाश थाँमकर अलख जगाती उलटी लेटी पिपर टहनियां रात टिटहरी !
अंगारों पर खून पसीना मेहनत सूद उजाड़ जिंदगी सुने न अमुआं छाँह गिलहरी ! कन्धों गिरगिट अस्तीनों के विषधर अमरबेल सेनापति सींचें तुलसी खड़ी कचहरी ! मौन ओंठ क्या बोलेंगे खोलेंगे क्या गूंगे राज शकुनिया पाशों के, दुर्दशा देख भयभीत बहुत हैं बाग़ बगीचे बिछे हैं टेशु झरे पलाशों के,
चूँगी चिलम रमी शिव पिंडी प्यासे नंदी मेघ निहारें पतरोई में पुरी जलहरी ! अंगारों पर खून पसीना मेहनत सूद उजाड़ जिंदगी सुने न अमुआं छाँह गिलहरी ! कन्धों गिरगिट अस्तीनों के विषधर अमरबेल सेनापति सींचें तुलसी खड़ी कचहरी ! भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

May 03

चीन्तिओं के बिल में ----नवगीत

Bholanath Posted by: Bholanath in Uncategorized | Comments
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मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम नवरात्रि की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...
चींटियों के बिल में हाँथ डार
खोज रहे मरुथल वनों का हाथी हिराया ! गोबर गौशाला में धूनी धुंआँ पलक मलते रहे खेत इल्लियों ने खाया ! मुनमुनाती रही बहरे कानों में बगदर पिघलता रहा शीशा रह रह भट्ठी के भीतर, उबलता रहा लहू लोहित शिराओं का तनते रहे आँख आँगन में परदेशी तीतर, शरहद के शेरों के बंधे पंजे खोले ना बन्दर
सोया है बरगद की छाया ! चींटियों के बिल में हाँथ डार
खोज रहे मरुथल वनों का हाथी हिराया ! गोबर गौशाला में धूनी धुंआँ पलक मलते रहे खेत इल्लियों ने खाया ! चिपकाये छाती से छौंना ललछर मुँह बंदरिया कूद रही फुनगियों की मोटी डरैया, नई उलहन की गोफरी में खीटा सीका में आँख धरे टेय रही मूंछें बिलैया, सहे पीठ हौदों की चाबुक पहाड़ों के आगे ऊँटों ने मूँड न उठाया ! चींटियों के बिल में हाँथ डार
खोज रहे मरुथल वनों का हाथी हिराया ! गोबर गौशाला में धूनी धुंआँ पलक मलते रहे खेत इल्लियों ने खाया ! मृत्यु बोध मजबूरी तोड़ेगी ओंठों की फेफरी
पानी की जलती चिनगी मछलियाँ, हाँथ की मशालें लाँघेंगी संशय शिखर खोजेंगी बुर्जों में पनघट की गलियाँ,
चन्दन की माला खूंटी ने लीली जाने न हठ धर्मी रानी शनीचर की माया !
चींटियों के बिल में हाँथ डार
खोज रहे मरुथल वनों का हाथी हिराया ! गोबर गौशाला में धूनी धुंआँ पलक मलते रहे खेत इल्लियों ने खाया ! भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
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संपर्क – 8989139763

May 03

Jostedalsbreen

Valerie Dohren Posted by: Valerie Dohren in English Poems | Comments
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A bridal gown
encrusted with sparkling crystals

Its liquid train solidified
on cathedral steps

seven beautiful sisters - her bridesmaids

with silken ribbons
falling, cascading …..

Frozen in time beneath a starry sky
adorned with swirling drapes

Dancing, dancing …..

Ah, the splendour … captures the soul

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