For some time now,
I have been so down,
क्या कहूँ कि आज कल का ये समय कैसा तो है
आदमी खेलता है नफरतों से , दूर रहता प्यार से
नफरत से की गयी चोट का हर जख्म हमने सह लिया
घायल हुए उस रोज हम जिस रोज मारा प्यार से
प्यार के एहसास से जब जब रहे हम वेखबर
तब तब लगा हम को की हम जी रहे बेकार से
इजहार राज ए दिल का बह जिस रोज मिल करने लगे
उस रोज से हम पा रहे खुशबु भी देखो खार से
जालिम लगी दुनिया हमें हर शख्श बेगाना लगा
हर पल हमें धोखे मिले अपने ही ऐतबार से
ग़ज़ल :
मदन मोहन सक्सेना
No more, those blissful days
when we watched cotton candy trees blossom in the Spring,
listened to the trickle of silver streams
and the whisper of the wind through tall grasses.
All was well with the world
and life was full of promise.
But its an ill wind that blows now,
stirring my soul with bleak despair.
Everything comes to an end,
and I can see it in your eyes.
We are left with only an empty silence,
each with our own thoughts.
It’s the end of all things -
of all things that we once knew.
You are leaving ...
जालिम लगी दुनिया हमें हर शख्श बेगाना लगा
हर पल हमें धोखे मिले अपने ही ऐतबार से
नफरत से की गयी चोट का हर जख्म हमने सह लिया
घायल हुए उस रोज हम जिस रोज मारा प्यार से
प्यार के एहसास से जब जब रहे हम बेखवर
तब तब लगा हम को की हम जी रहे बेकार से
इजहार राज ए दिल का बह जिस रोज मिल करने लगे
उस रोज से हम पा रहे खुशबु भी देखो खार से
जब प्यार से इंकार हो तो इकरार से है बो भला
आने लगेगा तब मज़ा फिर इकरार का इंकार से
क्या कहूँ कि आज कल का ये समय कैसा तो है
आदमी ब्यापार से तो प्यार करता , दूर रहता प्यार से
ग़ज़ल :
मदन मोहन सक्सेना
जालिम लगी दुनिया हमें हर शख्श बेगाना लगा
बने रहें
दरबारी
O gentle as you please, my love,
I am yet still a maiden
And ‘though I yearn to know your will
My heart is heavy laden
For if I choose to lay with you
I deem that we should marry
As you would be the father of
The child that I may carry
I will not live a life of fear
Insulted and derided
And labelled as a worthless whore
Forevermore chastis’ed
So if you will not marry me
By you I’ll not be bedded
A maiden I shall stay, my love,
Until the day I’m wedded
मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
Lie with me
in a golden field of sun-ripened corn
beneath a beckoning sky
We shall listen to the gentle breeze
rising and falling, rising and falling
in sweet crescendos
synchronised with our love –
whispering, whispering
Lie with me
we shall seal our togetherness
with moistened lips
and eager breaths
before the falling of the sun
and the coming of the mellowing night
'मातृ दिवस ' पर अपनी प्रिय माँ का स्मरण करते हुए एवं सभी माओं को प्रणाम करते हुए -
माँ को जाना और, स्वयं मातृत्व में ढल के
प्रेम सुधा की वृष्टि मिली आँचल में पल के
रोम रोम है तरसता अब स्पर्श को उसके
हुई दूर , मैं ढूँढू तारों की चादर पर .....
............नीना शैल भटनागर
मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह श्रंगारिक नवगीत
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
सरबजीत ने देश कि लाज रख ली ,
उसके दिल ,गुर्दे थे तो निकाल लिये ,
अगर किसी नेता के टटोलते तो ,
देश को शर्मसार होना पड़ता ,
न दिल, जिगर ना खोजने पर दिमाग,
का कही पता चलता .
ज़िंदा देश को ,मुर्दा कंधे चला रहे हैं ,
चुप रहो ,
संसद को कब्रिस्तान बना रहे हैं
दिल के पास हैं लेकिन निगाहों से बह ओझल हैं
क्यों असुओं से भिगोने का है खेल जिंदगी।
जिनके साथ रहना हैं ,नहीं मिलते क्यों दिल उनसे
खट्टी मीठी यादों को संजोने का है खेल जिंदगी।
किसी के खो गए अपने, किसी ने पा लिए सपनें
क्या पाने और खोने का है खेल जिंदगी।
उम्र बीती और ढोया है, सांसों के जनाजे को
जीवन सफर में हँसने रोने का है खेल जिंदगी।
किसी को मिल गयी दौलत, कोई तो पा गया शोहरत
मदन बोले , काटने और बोने का ये खेल जिंदगी।
There is nothing left to say now.
Cherished dreams slip into nothingness
as they float away upon the sea of change
towards the far horizon, quietly surrendered,
beyond sight, beyond touch,
fading softly with the dying of the sun.
There is nothing left to say now.
Everything comes to an end,
and we all flounder in the darkness
like lost children with no hand to hold,
no place to go,
no new tomorrows.
There is nothing left to say now.
No more songs to sing, nor stories to tell,
no dawns, no sunsets in this new time,
as the light is forever extinguished,
and naught else remains
but oblivion …..
मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम नवरात्रि की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...
चार दशकों से
देखा है
व्यास हुए
बिना कविता मुए !
गीत लिखकर
मनीषी
कब्रों में
कितना निरास हुए !
देखता हूँ
आड़ी तिरछी
पन्नों की थूहर,
कविता नहीं
होती हैं
कवियों के मुंह पर,
कई कई बार
लोग बाग़
फिर भी
फूले वन पलाश हुए !
चार दशकों से
देखा है
व्यास हुए
बिना कविता मुए !
गीत लिखकर
मनीषी
कब्रों में
कितना निरास हुए !
कहना मुह आई
खरी खरी
आस नहीं करना,
घटिया
तुक बंदियों के
घाट कभी मत ठहरना,
धोबी के
गदहे हैं
घोड़े नहीं
देखे बेरास हुए !.
चार दशकों से
देखा है
व्यास हुए
बिना कविता मुए !
गीत लिखकर
मनीषी
कब्रों में
कितना निरास हुए !
जाल पुरे शब्दों
के धनुष
नहीं फेंकना,
लौटेंगे घायल
रथी फिर
शिविरों से देखना,
शब्द भेदी
वांणों के
तूणींर
कबके खलाश हुए !
चार दशकों से
देखा है
व्यास हुए
बिना कविता मुए !
गीत लिखकर
मनीषी
कब्रों में
कितना निरास हुए !
रेंगेंगे कितना
बैसाखियों के
लंगड़े,
उलझेंगे अरझेंगे
जालियों में
मकड़े,
दूध धुली
ओंठों के
गीत मधुर
झूले तलाश हुए !
चार दशकों से
देखा है
व्यास हुए
बिना कविता मुए !
गीत लिखकर
मनीषी
कब्रों में
कितना निरास हुए !
भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763
फिर एक घोटाला
अब की बारी आयी रेल की
पहले टू जी
फिर कॉमन वेल्थ
फिर कोयला
उसके बाद अंतरिक्ष
और आज
फिर एक घोटाला
फिर एक बार मीडिया में शोर
फिर एक बार नेताओं की तू तू मैं मैं
फिर एक बार सरकार की जाँच की बात
फिर एक बार जाँच के बहाने घोटाले को दबाने की साजिश
फिर एक बार समिति का गठन
फिर एक बार जनहित याचिका की उम्मीद
फिर एक बार उच्चत्तम न्यायालय से अपेछा
फिर एक बार जनता का बुदबुदाना
कि
जाने दो
सब एक जैसे हैं।
किन्तु
ऐसा कह कर
हम अपनी जिम्मेदारी से बिमुख नहीं हो सकते
अब समय आ गया
कि हम सब अपने
स्तर से लोगों को
आगाह करें
कि भ्रष्टाचार करना जितना बड़ा जुर्म है
उसे सहना
और भ्रष्टाचार देखकर
चुपचाप रहना भी कम बड़ा जुर्म नहीं है.
प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना
मदन मोहन सक्सेना .
मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम नवरात्रि की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...
कौन
घिस घिस कसेगा
कसौटियों में
और फिर
तरासेगा
भारत की मूरत वही !
खंडित
मुकुट है
घायल है गौरव
गिद्धों ने खाई
सोने की चिड़िया
समझ कर दही !
भोगी नहीं है
मुह की
आजादी
कानों सुनी है
देह दिखती उतारी
अंग्रेजों की वर्दी,
काढ़ा करू
वैद्य लगते हैं
जाहिल
अंग्रेजी गोली
बिन हटती नहीं है
नकुओं की शर्दी,
रेढ़ों की
देवदारु
पचगुरिया
की बौलें
नीमों की झौंडी
गिलोय न रही !
कौन
घिस घिस कसेगा
कसौटियों में
और फिर
तरासेगा
भारत की मूरत वही !
खंडित
मुकुट है
घायल है गौरव
गिद्धों ने खाई
सोने की चिड़िया
समझ कर दही !
देशी चिरैया
अंग्रेजी बोली
छलती हैं
छद्मी मुस्काने
चारा जुटाती
चुनगुन को तौलें,
खा खा कर
अपने ही
खेतों की
उमदा फसलें
उपजाऊ धरती को
बंजर बनाने की कौलें,
वैतरणी बोली
चौकड़ियाँ
भरती
आँगन
की बछिया
नरदों में प्यासी बही !
कौन
घिस घिस कसेगा
कसौटियों में
और फिर
तरासेगा
भारत की मूरत वही !
खंडित
मुकुट है
घायल है गौरव
गिद्धों ने खाई
सोने की चिड़िया
समझ कर दही !
तिरंगा फहराता
कुकुर बिलियाँ राजा
किले पर
पगड़ी को भूला
बिसरा है
ओंठों की बोली,
राधा की आबरू
रौंद रहीं
सिओलानें
हिजड़ों के आगे
खोल रहीं
छतियों की चोली,
मोहन की
मुरली
बजाये बंदरिया
पाँव
पगहा में बांधे
नचाये मन की कही !
कौन
घिस घिस कसेगा
कसौटियों में
और फिर
तरासेगा
भारत की मूरत वही !
खंडित
मुकुट है
घायल है गौरव
गिद्धों ने खाई
सोने की चिड़िया
समझ कर दही !
भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763
दोस्ती रूह,दोस्ती खुदा और इश्क की शुरुवात है
Dr.Sweet Angel
A bridal gown
encrusted with sparkling crystals
Its liquid train solidified
on cathedral steps
seven beautiful sisters - her bridesmaids
with silken ribbons
falling, cascading …..
Frozen in time beneath a starry sky
adorned with swirling drapes
Dancing, dancing …..
Ah, the splendour … captures the soul