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Apr 30

पिंजरा

rajtela1 Posted by: rajtela1 in हिंदी कविता Print PDF

 

मैं खुद के बनाए

पिंजरे में बंद पंछी सा हूँ

जो पिंजरे की

जालियों के पार

देख तो सकता है

पिंजरे के

नियम कायदों से

मन में छटपटाहट

भी होती है

कई बार खुद को बेबस

महसूस करता हूँ

स्वछन्द उड़ना चाहता हूँ 

पर पिंजरे से

इतना मोह हो गया

कोई दरवाज़ा खोल भी दे

तो चाह कर भी

उड़ नहीं पाऊंगा

30-04-2012

485-66-04-12

 

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