
चहरे पर भाव सहज आते नहीं किसी को बहकाते न कोई बात छिपी उससे निश्छल मन का दर्पण है वह सूर्य किरण की आभा सा है मुखड़ा उसका ख़ुली किताब के पन्ने सा |
सुरमई आँखों की कोरों में न कोई अवसाद छुपा है न ही विशद आंसुओं की लड़ी है केवल हँसी भरी है उन कजरारी अँखियों में मन चंचल करती अदाओं में ।
है अंकित एक-एक शब्द मन की किताब के पन्नों में उनको समेटा सहेजा है हर साँस से हर शब्द में वही चेहरा दीखता है खुली किताब के पन्ने सा |
यदि पढ़ने वाली आँख न हो कोई पन्ना खुला रहा तो क्या मन ने क्या सोचा क्या चाहा इसका हिसाब रखा किसने इस जीवन की आपाधापी में पढ़ने का समय मिला किसको पढ़ लिया होता यदि इस पन्ने को खिल उठता गुलाब सा मन उसका है मन उसका ख़ुली किताब के पन्ने सा |
आशा




