संपर्क
बहुत जरूरी,इस दुनिया में,है सबसे संपर्क बनाना
संपर्कों से आसां होता है हर मुश्किल काम बनाना
फूलों से संपर्क बनाती मधुमख्खी तब मधु मिलता है
भोर सूर्य की किरण छुए तन,फूल कमल का तब खिलता है
तीली जब संपर्क बनाती माचिस से तो आग लगाती
स्विच से है संपर्क तार का,तब ही बिजली ,आती जाती
प्रीत,प्रेम का प्रथम चरण है,नयनों से संपर्क नयन का
ये संपर्क बड़ा प्यारा है,मेल करा देता तन मन का
नर नारी के सम्पकों से,जग में आता है नवजीवन
खिलते पुष्प,फलित होते तरु,और महकते सारे उपवन
सूर्य ताप संपर्क करे जब,सागर जल से,बनते बादल
बादल से जल,जल से जीवन,संपर्कों से ,जगती है चल
काम पड़े दफ्तर में कोई,तो संपर्क काम मे आते
बरसों से लंबित मसला भी,है मिनटों में हल होजाते
तट भूमि ,उपजाऊ बनती,जब संपर्क बनाती नदिया
मोबाईल पर,बातें करना,संपर्कों का ही ,तो है जरिया
पूजा,पाठ, कीर्तन,साधन,प्रभु संपर्क अगर है पाना
बहुत जरूरी,इस दुनिया में,है सबसे ,संपर्क बनाना
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
दोस्तों के साथ जीते है अज हम
मेरे हमनसी मेरे हमसफ़र .तुझे खोजती है मेरी नजर
तुम्हें हो ख़बर की न हो ख़बर मुझे सिर्फ तेरी तलाश है
मेरे साथ तेरा प्यार है ,तो जिंदगी में बहार है
मेरी जिंदगी तेरे दम से है ,इस बात का एहसाश है
मेरे इश्क का है ये असर ,मुझे सुबह शाम की न ख़बर
मेरे दिल में तू रहती सदा , तू ना दूर है ना पास है
ये तो हर किसी का ख्याल है ,तेरे रूप की न मिसाल है
कैसें कहूं तेरी अहमियत मेरी जिंदगी में खास है
तेरी झुल्फ जब लहरा गयी, काली घटायें छा गयी
हर पल तुम्हें देखा करू ,आँखों में फिर भी प्यास है
मदन मोहन सक्सेना
मेरे हमनसी मेरे हमसफ़र .तुझे खोजती है मेरी नजर
तुम्हें हो ख़बर की न हो ख़बर मुझे सिर्फ तेरी तलाश है
मेरे साथ तेरा प्यार है ,तो जिंदगी में बहार है
मेरी जिंदगी तेरे दम से है ,इस बात का एहसाश है
मेरे इश्क का है ये असर ,मुझे सुबह शाम की न ख़बर
मेरे दिल में तू रहती सदा , तू ना दूर है ना पास है
ये तो हर किसी का ख्याल है ,तेरे रूप की न मिसाल है
कैसें कहूं तेरी अहमियत मेरी जिंदगी में खास है
तेरी झुल्फ जब लहरा गयी, काली घटायें छा गयी
हर पल तुम्हें देखा करू ,आँखों में फिर भी प्यास है
मदन मोहन सक्सेना
कभी मगरूर-ए-करम का खुद पर रहम देखा ,
कभी समंदर पे दरिया का शहर देखा ...........
चाह कर भी न मिल पाया उससे मैं कभी
रात ख्वाबों में जिसे हर नजर देखा .....................
ग़ज़ल (हकीक़त)
चेहरे की हकीक़त को समझ जाओ तो अच्छा है
तन्हाई के आलम में ये अक्सर बदल जाता है
मिली दौलत ,मिली शोहरत,मिला है मान उसको क्यों
मौका जानकर अपनी जो बात बदल जाता है
क्या बताये आपको हम अपने दिल की दास्ताँ
किसी पत्थर की मूरत पर ये अक्सर मचल जाता है
किसी का दर्द पाने की तमन्ना जब कभी उपजे
जीने का नजरिया फिर उसका बदल जाता है
मदन मोहन सक्सेना
जिंदगी भर उलझनों में फसा रहना मंजूर था मुझे
बस चाँद और साथ मै हूँ आज
कुछ सवालो के जवाब ढूंढने
साथ रात का संग था पर
उसके आगोश मे दोनों थे लिपटे !!
'तू अकेला है कितना चाँद ' बोला मैंने
जुस्तजू है कोई या बस जिन्दगी ठहरी
'तारो को बस साथ मिला, मेरी क्या बात हो
जो कोई नहीं मुझसा फिर क्या बात हो ' !!
जैसे ईश्वर
अँधेरे में रहा करता है साया साथ अपने पर बिना जोखिम उजाले में है रह पाना बहुत मुश्किल
ख्बाबो और यादों की गली में उम्र गुजारी है समय के साथ दुनिया में है रह पाना बहुत मुश्किल ..
कहने को तो कह लेते है अपनी बात सबसे हम जुबां से दिल की बातो को है कह पाना बहुत मुश्किल
ज़माने से मिली ठोकर तो अपना हौसला बढता
अपनों से मिली ठोकर तो सह पाना बहुत मुश्किल
कुछ पाने की तमन्ना में हम खो देते बहुत कुछ है क्या खोया और क्या पाया कह पाना बहुत मुश्किल
जालिम लगी दुनिया हमें हर शक्श बेगाना लगा
हर पल हमें धोखे मिले अपने ही ऐतबार से
नफरत से की गयी चोट से हर जखम हमने सह लिया
घायल हुए उस रोज हम जिस रोज मारा प्यार से
प्यार के एहेसIश से जब जब रहे हम बेखबर
तब तब लगा हमको की हम जी रहे बेकार से
इजहार राजे दिल का बो जिस रोज मिल करने लगे
उस रोज से हम पा रहे खुशबु भी देखो खार से
ग़ज़ल:
मदन मोहन सक्सेना
जालिम लगी दुनिया हमें हर शक्श बेगाना लगा
हर पल हमें धोखे मिले अपने ही ऐतबार से
नफरत से की गयी चोट से हर जखम हमने सह लिया
घायल हुए उस रोज हम जिस रोज मारा प्यार से
प्यार के एहेसIश से जब जब रहे हम बेखबर
तब तब लगा हमको की हम जी रहे बेकार से
इजहार राजे दिल का बो जिस रोज मिल करने लगे
उस रोज से हम पा रहे खुशबु भी देखो खार से
पैसा कमाऊं -पर गुरु किसको बनाऊं ?
इस दुनिया में ,देखा ऐसा सारे काम बनाता पैसा
पैसेवाला पूजा जाता
मेरे मन में भी है आता
मै भी पैसा खूब कमाऊं लेकिन किस को गुरु बनाऊँ ?
टाटा,बिरला और अम्बानी
सभी हस्तियाँ,जानी,मानी
सब के सब है खूब कमाते
पर ये है उद्योग चलाते
पर यदि है उद्योग चलाना
पहले पूँजी पड़े लगाना
मेरे पास नहीं है पैसे
तो उद्योग लगेगा कैसे?
एसा कोई सोचें रस्ता
जो हो अच्छा,सुन्दर,सस्ता
पैसा खूब,नाम भी फ्री का
धंधा अच्छा,नेतागिरी का बन कर भारत भाग्य विधाता हर नेता है खूब कमाता
राजा हो या हो कलमाड़ी
सबने करी कमाई गाढ़ी पर थे कच्चे,नये खेल में इसीलिये ये गये जेल में
पर कुछ नेता समझदार है
जैसे गडकरी और पंवार है
या कि बहनजी मायावती है
क्वांरी,मगर करोडपति है
ये सब नेता,मंजे हुए है
लूट रहे ,पर बचे हुए है
रख कर पाक साफ़ निज दामन
आता इन्हें कमाई का फन
इन तीनो को गुरु बना लूं
मै इनकी तस्वीर लगा लूं
एकलव्य सा ,शिक्षा पाऊं धीरे धीरे खूब कमाऊं गुरु दक्षिणा में क्या दूंगा
उन्हें अंगूठा दिखला दूंगा सीखे कितने ही गुर उनसे
काम करूंगा सच्चे मन से बेनामी कुछ फर्म बनालूँ
रिश्वत का सब पैसा डालूँ इनका इन्वेस्टमेंट दिखा कर
काला पैसा,श्वेत बनाकर बड़ा खिलाड़ी मै बन जाऊं
जगह जगह उद्योग लगाऊं या फिर एन. जी .ओ बनवा कर
इनके नाम अलाट करा कर
अच्छी सी सरकारी भूमि
करूं तरक्की,दिन दिन दूनी
रिश्तेदारों के नामो पर
कोल खदान अलाट करा कर
कोडी दाम,माल लाखों का
नहीं हाथ से छोडूं मौका लूट रहे सब,मै भी लूटूं मै काहे को पीछे छूटूं ?
या फिर जन्म दिवस मनवाऊँ
भेंट करोड़ों की मै पाऊँ काले पैसे को उजला कर
अपने नाम ड्राफ्ट बनवा कर
कई नाम से,छोटे छोटे
करूं जमा मै पैसे मोटे या हज़ार के नोटों वाली माला पहनूं , मै मतवाली ले शिक्षा,गुरु घंटालों से बचूं टेक्स के जंजालों से
केग रिपोर्ट में यदि कुछ आया जनता ने जो शोर मचाया उनका मुंह बंद कर दूंगा जांच कमेटी बैठा दूंगा बरसों बाद रिपोर्ट आएगी
भोली जनता ,भूल जायेगी नेतागिरी है बढ़िया धंधा
कभी नहीं जो पड़ता मंदा हींग ,फिटकरी कुछ न लगाना फिर भी आये रंग सुहाना नाम और धन ,दोनों पाओ
सत्ता का आनंद उठाओ मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
दशहरे के दिन वो हमारे घर आये
और बोले, बच्चे रावण देखने गए है
हमने सोचा चलो आपको ही देख आये
हमने कहा सच होता बड़ा तमाशा है
रावण को देखने सब जाते है
राम को देखने कोई नहीं जाता है
आप तो हमेशा से रूदियाँ तोड़ते आये है
अच्छा हुआ रावण देखने नहीं गए, हमारे यहाँ आये है
पर बच्चो को वहां क्या मज़ा आएगा
आप तो यहाँ है
बच्चो को रावण कैसे नज़र आएगा
Now I admit that you are the most merciful.
And I admit that you always take care of me.
And I regret for not remembering you at all.
And I regret for not using my eyes to see.
To see that I was lost and the wrong things I made.
Thinking that by this way I will be very pleased.
Then I realize that knowing you is all what I need.
To get closer where I could be happy Indeed.
हम को खबर लगी आज कल अब ये
चमचों की होने लगी आज भरमार है
मैडम जब हँसती हैं हँस देते कांग्रेसी
साथ साथ रहने को हुए बेकरार हैं
चमचों का होने लगा आज सत्कार है
चमचों ने पाए लिया ,खूब माल खाय लिया
जनता है भूखी प्यासी ,हुआ हाहाकार है
काब्य प्रस्तुति :
मदन मोहन सक्सेना
किसी के दिल में चुपके से रह लेना तो जायज है
मगर आने से पहले कुछ इशारे भी किये होते
नज़रों से मिली नजरे तो नज़रों में बसी सूरत
काश हमको उस खुदाई के नज़ारे भी दिए होते
अपना हमसफ़र जाना ,इबादत भी करी जिनकी
चलतें दो कदम संग में ,सहारे भी दिए होते
जीने का नजरिया फिर अपना कुछ अलग होता
गर अपनी जिंदगी के गम ,सारे दे दिए होते
दिल को भी जला लेते और ख्बाबों को जलाते हम
गर मुहब्बत में अँधेरे के इशारे जो किये होते
ग़ज़ल:
मदन मोहन सक्सेना
मोतीचूर,गुलाब जामुन,और जलेबी-क्यों?
मोतीचूर,
बून्दियों का है वो संगठित रूप,
जो सहकारिता का प्रतीक है,जिसमे,
सैकड़ों बूंदिया,हाथ में दे हाथ
बिना अपना व्यक्तित्व खोये,
जुडी रहती है आपस में,
अन्य बून्दियों के साथ
मोती स्वरुप,
बून्दियों का ये संयुक्त रूप,
जिसे बनाने में,
इन मोती सी बून्दियों को चूरा नहीं है जाता मोतीचूर है क्यों कहलाता?
दुग्ध को जब हम करते है गरम,
तो वो उबलता है,उफनता है
मानव स्वभाव से,दूध का स्वभाव,
कितना मिलता जुलता है
पर यदि धीरज के खोंचे से,
दूध को हिलाते रहो,
तो उफान रुक जाता है
और दुग्ध,धीरज वान होकर,
धीरे धीरे बंध जाता है
दूध,जब इस तरह,अपने स्वभाव से,
करता है उफान या गुस्सा खोया
दूध का यह बंधा रूप,कहलाता है खोया
पर जब इस खोये की,
छोटी छोटी गोलियों को,घी में तल कर,
किया जाता है रस में लीन
तो उन्हें कहते है 'गुलाब जामुन'
विचारणीय बात ये है,
कि ये रसासिक्त गोलियां,
न तो रखती है गुलाब कि खुशबू,
न जामुन कि रंगत,या स्वाद आता है
तो यह गुलाब जामुन क्यों कहलाता है?
मैदे का घोल,
गर्मी से एक दो दिवस बाद,
लगता है उफनने,और खमीर बना ये पदार्थ,
जिसे जब,एक छिद्र के माध्यम से,
अग्नि तपित घी में डाल कर,
विभिन्न स्वरुप में तल कर,
जब प्यार कि चासनी में डुबोया जाता है
तो उसका यह रसमय व्यक्तित्व,सभी को भाता है
पर जब टेड़े मेडे आकारों की ये रसासिक्त कृतियाँ,
नहीं होती है जली कहीं भी
क्यों कहलाती है जलेबी?
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'