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Jan 07

Lost

Valerie Dohren Posted by: Valerie Dohren in English Poems | Comments
Tagged in: Untagged 

Night falls, and only dreams remain
Dim dreams of all that might have passed -
Set deep in shadows, thus my soul
Beneath the dying sun is cast

For darkness steals tomorrow’s light
And folly be a trusting heart -
‘Tis those with feathered wings that soar
To vistas which new hope impart

So lost, as in a limbo’d place,
I yearn that I shall find a home -
With no more endless paths to tread
And no more empty fields to roam

But on through des’late years I fare
‘Cross barren lands beset with woe -
E’er searching for a place to be
E’er searching for a place to go

Ah, then to seek my heart’s desire
To cherish ever as my own -
The one to set my soul aflame
That I may be no more alone

(O should I ever, shall I dare,
With open arms to full embrace
Yet seek the thing I deem to love
Then gaze upon that one sweet face)

But faint my will to dare to do
All courage does my heart deny
Forever weak, condemned by fear,
And therefore shall my soul yet die

Soft petals from the rose thus fall
For I am but a wilted flower

Encaptured in a hapless world
And seeded in a shaded bower

Jan 07

जिव्हा और दांत -मिया और बीबी वाली बात

ghotoo Posted by: ghotoo in Uncategorized | Comments
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     जिव्हा और दांत -मिया और बीबी वाली बात जिव्हा और दांत दोनों रहते है साथ साथ एक सख्त है ,एक मुलायम है मगर दोनों सच्चे हमदम है इनका रिश्ता है ऐसे मियां और बीबी हो जैसे जिव्हा ,पत्नी सी ,कोमल और नाजुक
 दांत,पति से ,स्ट्रोंग और मजबूत दांत चबाते है ,जिव्हा स्वाद पाती है पति कमाता है,बीबी मज़ा उठाती  है
जिव्हा,चंचल चपल और चुलबुली है बातें बनाती रहती,जब तक खुली है     
दांत, स्थिर ,थमे हुए और सख्तजान है चुपचाप ,बिना शिकायत के ,करते काम है बस जब थक जाते है तो किटकिटाते है और जीभ जब ज्यादा किट किट करती है,
उसे काट खाते है जैसे कभी कभी अपनी पत्नी पर ,
पति अंकुश लगाता है मगर फिर भी ,दांतीं की तरह,
उसे अपने आगोश में छुपाता  है दांतों के बीच में जब भी कुछ है फंस  जाता  जिव्हा को झट से ही इसका पता चल जाता और वह इस फंसे हुए कचरे को निकालने ,
सबसे पहले पहुँच जाती है और जब तक कचरा निकल नहीं जाता ,
कोशिश किये जाती है जैसे पति की हर पीड़ा ,पत्नी समझती है और उसकी हर मुश्किल में ,
आगे बढ़ कर मदद करती है पति पत्नी जैसे ही इनके हालत होते है दिन भर अपना अपना काम करते है ,
पर रात को चुपचाप ,साथ साथ  सोते है मदन मोहन बाहेती'घोटू'
 

Jan 06

हिंदी साहित्य में नवगीत

Bholanath Posted by: Bholanath in Uncategorized | Comments
Tagged in: Untagged 

पिछले  अंक में जैसा की शम्भुनाथ जी ने लिखा है  ,जिसका विवर ण दिए जाने पर यह शंका की जा सकती है की अज्ञेय द्वारा संकलित और सम्पादित  चार सप्तकों के अनुकरण के रूप में अथवा नवगीत नमक अक नये काव्यान्दोलन का नेतृत्व ग्रहण करने के उदेश्य से  ये तीन नवगीत दशक प्रकाशित किये जा रहे हैं!किन्तु वास्तविकता यह है की अज्ञेय द्वारा सम्पादित सप्तकों में और इन नवगीत दसको में कोई तुल्नीयता या सद्रश्यता नहीं है !अज्ञेय ने लगभग  आठ आठ वर्षों की अवधि के अंतराल से प्रथम तीन सप्तकों का सम्पादन प्रकाशन किया !अल्पज्ञात नये यश प्रार्थी कविओं को प्रोत्साहित करने ,ख्याति दिलाने और स्थापित करने के उद्देश्य से उन्होंने तार सप्तक १९४३ दूसरा सप्तक १९५१ और तीसरा सप्तक १९५८ का का प्रकाशन किया और तीसरे प्रकाशन के लगभग दो दशक बाड चौथे सप्तक का प्रकाशन  संपादन शायद इस दृष्टि से किया की कहीं  लोग यह न समझ लें की नै कविता का युग समाप्त हो गया है या नै कविता का नेतृत्व यागे के हांथों से छीन गया है !इसके विपरीत प्रस्तुत योजना के अंतर्गत तीनों दशकों का प्रकाशन अक ही साथ नवगीत के प्रादुर्भाव के तीन दशकों के के उपरांत हो रहा है !...................क्रमशः

 

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Jan 06

आँगन भर सीलन

Bholanath Posted by: Bholanath in Uncategorized | Comments
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कितने दिन बीते
घिनौची को रीते बगरी है आँगन भर सीलन !
जल के सताये
पुरखे पर्वत से आये थके पांव चल चल के मीलन !
पिठाहीं में लादे गिरस्ती बंजर में सुन्दर बस्ती बसाई,
भोगी व्यथाओं की छोली छाती में बंशधर हो गये कसाई,
मूड के मुरैठे
स्टेचर में बैठे गंधाती रांपी की छीलन ! कितने दिन बीते
घिनौची को रीते बगरी है आँगन भर सीलन !
जल के सताये
पुरखे पर्वत से आये थके पांव चल चल के मीलन !
अधूरी अभिव्यक्तियों के पंख कटे फडफडाते मुल्क भर कबूतर,
महक मुरवे की गायब है सोने की चिड़िया है गोबर से बदतर,
लामबंद लंका पीटे कौन डंका व्याकुल है सबरी सी भीलन !
कितने दिन बीते
घिनौची को रीते बगरी है आँगन भर सीलन !
जल के सताये
पुरखे पर्वत से आये थके पांव चल चल के मीलन !
जन्मों की मूक बधिर पत्थर अहिल्या देवराज इंद्र की छली,
मंत्र पढ़े हवन किये हाँथ जले संतों के मूंड की बलाय ना टली,
देख रहीं अँखियाँ जटा जूट लिखियाँ ककवा ककईयों की खीलन !
कितने दिन बीते
घिनौची को रीते बगरी है आँगन भर सीलन !
जल के सताये
पुरखे पर्वत से आये थके पांव चल चल के मीलन !
भोलानाथ डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर ,जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क -०९४२५८८५२३४
Jan 06

आँगन भर सीलन

Bholanath Posted by: Bholanath in Uncategorized | Comments
Tagged in: Untagged 
कितने दिन बीते
घिनौची को रीते बगरी है आँगन भर सीलन !
जल के सताये
पुरखे पर्वत से आये थके पांव चल चल के मीलन !
पिठाहीं में लादे गिरस्ती बंजर में सुन्दर बस्ती बसाई,
भोगी व्यथाओं की छोली छाती में बंशधर हो गये कसाई,
मूड के मुरैठे
स्टेचर में बैठे गंधाती रांपी की छीलन ! कितने दिन बीते
घिनौची को रीते बगरी है आँगन भर सीलन !
जल के सताये
पुरखे पर्वत से आये थके पांव चल चल के मीलन !
अधूरी अभिव्यक्तियों के पंख कटे फडफडाते मुल्क भर कबूतर,
महक मुरवे की गायब है सोने की चिड़िया है गोबर से बदतर,
लामबंद लंका पीटे कौन डंका व्याकुल है सबरी सी भीलन !
कितने दिन बीते
घिनौची को रीते बगरी है आँगन भर सीलन !
जल के सताये
पुरखे पर्वत से आये थके पांव चल चल के मीलन !
जन्मों की मूक बधिर पत्थर अहिल्या देवराज इंद्र की छली,
मंत्र पढ़े हवन किये हाँथ जले संतों के मूंड की बलाय ना टली,
देख रहीं अँखियाँ जटा जूट लिखियाँ ककवा ककईयों की खीलन !
कितने दिन बीते
घिनौची को रीते बगरी है आँगन भर सीलन !
जल के सताये
पुरखे पर्वत से आये थके पांव चल चल के मीलन !
भोलानाथ डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर ,जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क -०९४२५८८५२३४
Jan 06

गुनाहगार

LOve and Hate Posted by: LOve and Hate in हिंदी कविता | Comments
Tagged in: SAD , Poetry , nostalgia , love , Hindi Poem

कोई दीवान लिख तू जाता मोहब्बत के हामि 
कोई अजमाया तरीका हम भी सीख लेते 
जो निकले थॆ अंधरी राहों अकेले ही 
खुदा!!दो आँखों की भीख भी मांग लेते !!!

गुनाहगार पर कौन है, किसको बदे हम 
इश्क कातिल था और बदनसीब बने हम 
इन्सान था मै और फ़रिश्ता माशूका वो थी 
जो आतिश-ओ शबनम मिले, कौन भला बचे !!

बस थक गया हूँ इश्क और उसकी बातों से 
उस हुस्न और अपनी इबारतों-यादों से 
मुझको बचाओ इस मैफिल की सबाहत से 
कोई जनाजा उठाओ की हम बेसब्र हुए !!!
















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Jan 05

हिंदी साहित्य में नवगीत

Bholanath Posted by: Bholanath in Uncategorized | Comments
Tagged in: Untagged 

पिछले  अंक में जैसा की शम्भुनाथ जी ने लिखा है  ,जिसका विवर ण दिए जाने पर यह शंका की जा सकती है की अज्ञेय द्वारा संकलित और सम्पादित  चार सप्तकों के अनुकरण के रूप में अथवा नवगीत नमक अक नये काव्यान्दोलन का नेतृत्व ग्रहण करने के उदेश्य से  ये तीन नवगीत दशक प्रकाशित किये जा रहे हैं!किन्तु वास्तविकता यह है की अज्ञेय द्वारा सम्पादित सप्तकों में और इन नवगीत दसको में कोई तुल्नीयता या सद्रश्यता नहीं है !अज्ञेय ने लगभग  आठ आठ वर्षों की अवधि के अंतराल से प्रथम तीन सप्तकों का सम्पादन प्रकाशन किया !अल्पज्ञात नये यश प्रार्थी कविओं को प्रोत्साहित करने ,ख्याति दिलाने और स्थापित करने के उद्देश्य से उन्होंने तार सप्तक १९४३ दूसरा सप्तक १९५१ और तीसरा सप्तक १९५८ का का प्रकाशन किया और तीसरे प्रकाशन के लगभग दो दशक बाड चौथे सप्तक का प्रकाशन  संपादन शायद इस दृष्टि से किया की कहीं  लोग यह न समझ लें की नै कविता का युग समाप्त हो गया है या नै कविता का नेतृत्व यागे के हांथों से छीन गया है !इसके विपरीत प्रस्तुत योजना के अंतर्गत तीनों दशकों का प्रकाशन अक ही साथ नवगीत के प्रादुर्भाव के तीन दशकों के के उपरांत हो रहा है !...................क्रमशः

 

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Jan 04

हिंदी साहित्य में नवगीत

Bholanath Posted by: Bholanath in Uncategorized | Comments
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हिंदी साहित्य  में नवगीत  के पीछे शम्भुनाथ सिंह की बहुत ही मनोहारी विस्तृत योजना थी उन्होंने अपनी सम्पादकीय में उल्लेख किया उन्हीं के शब्दों में यदि उनकी योजना क्रमबद्ध तरीके से लिखूं तो सायद पाठकों को पड़ने और समझने में अधिक आसानी होगी अतः नवगीत की पृष्ठभूमि कहना अधिक उचित होगा

प्रस्तुत योजना के पीछे अक लम्बे अघोषित सहित्यिक इतिहास छिपा है ...........क्रमशः

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Jan 04

कबिरा की चाकी

Bholanath Posted by: Bholanath in हिंदी कविता | Comments
Tagged in: Untagged 

नये नये मुल्ले

कर कर के कुल्ले

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Jan 04

Demon Skies

Valerie Dohren Posted by: Valerie Dohren in English Poems | Comments
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The pale moon floats through demon skies
Her aspect cold and eerie
Against the raging storm she vies –

Her heart thus ever weary

So solitary in the night
Suspended there in sorrow
Yet waiting for the dawn’s sweet light -
A brighter new tomorrow

All frenzy quits in daytime’s glow
For silent be the morning -
And deep in shadows set below










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Jan 03

हिंदी साहित्य में नवगीत

Bholanath Posted by: Bholanath in Uncategorized | Comments
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समसामयिक  नवगीत की की प्रष्ठभूमि १९८२ में जनमानस के सामने प्रमुख रूप से नवगीत दशक एक रूप में स्व.श्री शम्भुनाथ सिंह के द्वारा सम्पादित काव्य प्रवृति का  प्रथम एवम आधिकारिक संकलन है !यह संकलन पराग प्रकाशन दिल्ली द्वारा किया गया जिसमे स्वातंत्रयोत्तर युग के प्रथम दशक में उभरे दस  नवगीतकारों के उस समय के समसामयिक नवगीतों को संकलित किया गया था इस इस प्रकार हिंदी साहित्य  को और अधिक सम्रिध्य्शाली और प्रभावी गीतों से सजय जाने लगा  आज फ़िल्मी गीतों से लेकर भजन तक अख़बारों से लेकर पत्रिकाओं और इलेक्ट्रानिक युग के गीत भी बखूबी गये जा रहे हैं !.................................

भोलानाथ 
डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर 
,जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क -०९४२५८८५२३४ 

 



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Jan 03

जारी हैं कहर

Bholanath Posted by: Bholanath in Uncategorized | Comments
Tagged in: Untagged 

जारीजारी हैं 
कहर पर कहर 
रंगहीन हो रहे गाँव और शहर 
पीलिया की मार से 
सूख रही हरियाली ! 
उजाड़ बाड
हरहों से 
गाँव गली ढोरहों से 
कैसे बचें और कैसे करें 
हम अपनी रखवाली !
बार ब़ार उजड़ी 
और बची हुई 
अपने आप में 
परेशान और सहमी है दिल्ली, 
लूहान लहू अपने ही 
नखधारी पंजों से 
नोंच रही नाहक 
खिसियानी बिल्ली,
सुबह की 
खबर अखबारी 
शाम को बदली 
और बदले दरबारी 
चुहिया पंचाईत ने ख़बरें उछाली !
जारीजारी हैं 
कहर पर कहर 
रंगहीन हो रहे गाँव और शहर 
पीलिया की मार से 
सूख रही हरियाली ! 
उजाड़ बाड
हरहों से 
गाँव गली ढोरहों से 
कैसे बचें और कैसे करें 
हम अपनी रखवाली !
संघर्षी इतिहासों की अर्थी 
कन्धों उठाये 
आकर्षण के 
केंद्र हैं मशखरे,
पंथ हीन पांव 
गंधाती गलियों में भटके 
रंगीन अजगर 
दे रहे मशवरे,
दोनों वक्त 
दोहरी अज़ान 
तहखाने बाँट रही समाधान 
प्रश्नों के 
मकड़ जाल में उलझे सवाली !
जारीजारी हैं 
कहर पर कहर 
रंगहीन हो रहे गाँव और शहर 
पीलिया की मार से 
सूख रही हरियाली ! 
उजाड़ बाड
हरहों से 
गाँव गली ढोरहों से 
कैसे बचें और कैसे करें 
हम अपनी रखवाली !
काठ के घोड़ों पर निकली है 
भ्रमण में 
मंत्रियों के साथ 
सम्राट की सवारी,
जत्थों पर लाठी 
हांथों की 
लिखी पढ़ी अर्जियां 
फाड़ रहे दोगले दरबारी,
ताज और 
तख़्त धनी हैं 
रत्न मुकुट 
माथों में ठनी हैं 
संरक्षण में संतों के पलते मवाली ! 
जारीजारी हैं 
कहर पर कहर 
रंगहीन हो रहे गाँव और शहर 
पीलिया की मार से 
सूख रही हरियाली ! 
उजाड़ बाड
हरहों से 
गाँव गली ढोरहों से 
कैसे बचें और कैसे करें 
हम अपनी रखवाली !


भोलानाथ 
डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर 
,जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क -०९४२५८८५२३४ 

Jan 03

???

angelmarie Posted by: angelmarie in Uncategorized | Comments
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I am just looking for some thing fun and exciting to do...any ideas??? someone inbox me... :)

Jan 03

मेरी डायरी का हर पन्ना .....

ghotoo Posted by: ghotoo in Uncategorized | Comments
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मेरी डायरी का हर पन्ना .....
मैंने जो भी लिखा प्यार में,यादगार हर पेज हो गया मेरी डायरी का हर पन्ना ,अब तो दस्तावेज  हो गया सर्दी ,गर्मी और बसंत ने,ऐसा ऋतू का चक्र चलाया आज बन गया कल और कल बनने फिर से अगला कल आया आये ,गये ,बहुत से सुख दुःख ,कभी हंसाया ,कभी रुलाया  दिया किसी अपने ने धक्का,और किसी ने गले लगाया  
पल पल बदली ,जीवन की गति ,धीमा ,मध्यम,तेज हो गया मेरी डायरी का हर पन्ना,अब तो दस्तावेज  हो गया जब तक कायम रही जवानी,खूब मौज और मस्ती मारी खूब मज़ा जीवन का लूटा,खूब निभाई दुनियादारी जब तक दिन था,रहा चमकता ,अब आई ढलने की बारी बादल ढक ,निस्तेज कर गए  ,पाबंदिया लग गयी सारी खाया पिया जवानी में जो ,उमर बढ़ी,परहेज हो गया मेरी डायरी का हर पन्ना ,अब तो दस्तावेज हो गया मदन मोहन बाहेती'घोटू'
   

Jan 03

सर्दी का सन्डे

ghotoo Posted by: ghotoo in Uncategorized | Comments
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    सर्दी का सन्डे 
सन्डे की छुट्टी और सर्दी का मौसम बड़ा ही सुहाना ये होता है आलम जल्दी से उठने में आता है आलस दुबके ,रजाई में,लेटे  रहो बस 
गुड मोर्निंग का ये तरीका है प्यारा बिस्तर में मिल जाए,चाय का प्याला सवेरे सवेरे ,बड़ा मन को मोहे मिले नाश्ते में ,जलेबी और पोहे या आलू परांठों को,मख्खन से खाना और गाजर का हलवा ,लगे है सुहाना मिले लंच में खाने को ताज़ी ताज़ी मक्का की रोटी और सरसों की भाजी दुपहरी में छत पर ,गरम धूप  खाना 
बीबी और बच्चों से गप्पें  लगाना कभी रेवडी तो कभी मूंगफली हो गरमा गरम कुछ पकोड़ी तली हो कभी जामफल तो कभी तिल  की चिक्की 
कभी पाव  भाजी,कभी आलू टिक्की डिनर में कढी संग,बिरयानी प्यारी या छोले भठूरे की जोड़ी निराली और स्वीट डिश  में हो ,गुलाब जामुन यूं ही खाते पीते ,गुजर जाता है दिन टी .वी में पिक्चर का लेते मज़ा हम सन्डे की छुट्टी और सर्दी का मौसम मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Jan 02

ग़ज़ल

Madans Posted by: Madans in शायरी | Comments
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सजा क्या खूब मिलती है , किसी से दिल लगाने की
तन्हाई की महफ़िल में आदत हो गयी गाने की

हर पल याद रहती है , निगाहों में बसी सूरत तमन्ना अपनी रहती है खुद को भूल जाने की

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Jan 01

पहचानिए बदलते परिवेश को

Bholanath Posted by: Bholanath in Uncategorized | Comments
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bbb

अब और नहीं बाँटिये

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Jan 01

अमर बेल

ghotoo Posted by: ghotoo in Uncategorized | Comments
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       अमर बेल तरु के तने से  लिपटी कुछ लताएँ पल्लवित पुष्पित हो ,जीवन महकाए और कुछ जड़ हीन बेलें ,
तने का सहारा ले,
वृक्ष पर चढ़ जाती डाल डाल ,पात पात ,जाल सा फैलाती वृक्ष का जीवन रस ,सब पी जाती है हरी भरी खुद रहती ,वृक्ष को सुखाती है उस पर ये अचरज वो ,अमर बेल कहलाती है जो तुम्हे सहारा दे,उसका कर शोषण हरा भरा रख्खो तुम ,बस  खुद का जीवन जिस डाली पर बैठो,उसी को सुखाने का क्या यही तरीका है ,अमरता पाने का ?
मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Jan 01

नब बर्ष (2013)

Madans Posted by: Madans in हिंदी कविता | Comments
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नब बर्ष (2013) की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।




मंगलमय हो आपको नब बर्ष का त्यौहार
जीवन में आती रहे पल पल नयी बहार
ईश्वर से हम कर रहे हर पल यही पुकार
इश्वर की कृपा रहे भरा रहे घर द्वार..

मुझको जो भी मिलना हो ,बह तुमको ही मिले दौलत
तमन्ना मेरे दिल की है, सदा मिलती रहे शोहरत
सदा मिलती रहे शोहरत  और रोशन नाम तेरा हो
ग़मों का न तो साया हो  निशा में ना  अँधेरा हो

नब बर्ष आज आया है , जलाओ प्रेम के दीपक
गर जलाएं  प्रेम के दीपक  तो  अँधेरा दूर हो जाए
गर रहें हम प्यार से यारों और जीएं और जीने दें
अहम् का टकराब  पल में ही यारों चूर हो जाए

मनाएं हम सलीखें  से तो रोशन ये चमन होगा
सारी दुनियां से प्यारा और न्यारा  ये बतन होगा
धरा अपनी ,गगन अपना, जो बासी  बो भी अपने हैं
हकीकत में बे बदलेंगें ,दिलों में जो भी सपने हैं

नब बर्ष (2013) की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

काब्य प्रस्तुति :
मदन मोहन सक्सेना

Jan 01

वर्ना .................?

ghotoo Posted by: ghotoo in Uncategorized | Comments
Tagged in: Untagged 

  वर्ना .................?
नए वर्ष की नयी सुबह,
दिल्ली में सूरज नहीं निकला शायद  वह ,दिल्ली में ,
देश की एक बेटी के साथ ,
कुछ दरिंदों द्वारा किये गए ,
बलात्कार से लज्जित था या शायद,
देश के नेताओं की सुस्त प्रतिक्रिया ,
और व्यवहार से लज्जित था या शायद , दामिनी की आत्मा ने ऊपर पहुँच कर,
उससे कुछ प्रश्न किये  होंगे,
और उससे कुछ जबाब देते न बना होगा ,
तो उसने कोहरे की चादर  में,
अपना मुंह छुपा लिया होगा क्योंकि अगर सूरज दिल्ली का नेता होता ,
तो बयान  देता,
ये घटना उसके अस्त होने के बाद हुई,
इसलिए इसकी जिम्मेदारी चाँद पर है उससे जबाब माँगा जाय   
और यदि उससे यह पूछा जाता कि ,
क्या दिन में ऐसी  घटनाएं नहीं होती ,
तो शायद वो स्पष्टीकरण देता ,
कि  जब बादल उसे ढक  लेते है,
तब ऐसा हो जाता होगा सब अपनी जिम्मेदारी से,
कैसे कैसे बहाने बना ,
बचने की कोशिश करते रहते है  
और दामिनियोन  की अस्मत लुटती रहती है पर अब जनता का आक्रोश जाग उठा है ,
बहाने बनाना छोड़ दो ,
थोडा सा डरो ,
और कुछ करो वरना .............?
मदन मोहन बहेती'घोटू'

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