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Apr 03

तकदीर की कैद...

anjaan pathik Posted by: anjaan pathik in हिंदी कविता | Comments
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हाथ के पिंजड़े में 
कैद कर रखी है किसीने 
तकदीर सबकी ..||
एक शिकारी है 
जो जानता है सबकी कमजोरियां 
जो जानता है
कैसे मजबूर करना है किसको ..??
लकीरों की बेड़ियों से बाँध रखता है वो 
तडपती ,मचलती उन तकदीरों को 
जिन्होंने ख्वाब देखा था कभी 
आज़ाद हवा को चूमकर,
हर् फिजा में अपनी कामयाबी की खुशबू घोलने का ||

आज याद आया ...
मैं इस तकदीर को ही आज़ाद कराने आया था 
ज़मीं पे ...
यही तो मकसद था मेरा 
वरना तो,
सुकूं 
जन्नत में भी कम नहीं ...||

Mar 31

इतना काफी है.जी

anjaan pathik Posted by: anjaan pathik in शायरी | Comments
Tagged in: Untagged 

"मैं तुम्हारा हूँ" इसपर यकीं के लिए नज़रें उलझी रहे ,इतना काफी है.जी ||
तुमसे रोजाना छिप छिप के मिलना है तो
नींदें आती रहे ,इतना काफी है जी||
इबादत कभी हमको करनी हो जो.
तुमसे बातें करूँ ,इतना काफी है जी||
सात जन्मों को हो पल में जीना अगर
लब से छू लो जो तुम ,इतना काफी है जी..||
तुमको एकटक मैं नज़रों से पीता रहूँ
तिश्नगी के लिए ,इतना काफी है जी.... (तिश्नगी =प्यास )||
... धडकनें तुमको छूकर गुज़रती रहे
दिल्लगी के लिए, इतना काफी है जी ..||
तुमको रखकर ख्यालों में सांसें मैं लूँ
जिंदगी के लिए ,इतना काफी है जी ......||
तुम को मंजिल मैं मानूं और चलता रहूँ
इस सफर के लिए ,इतना काफी है जी....................||
हमने तो जाने क्या क्या है कह भी दिया
कभी तुम भी कहो ,इतना काफी है जी.....
कभी तुम भी कहो ,इतना काफी है जी.....||

Mar 31

हर अश्क पे मैं,...

anjaan pathik Posted by: anjaan pathik in हिंदी कविता | Comments
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हर अश्क पे मैं, मैखाने के जाम नहीं लिखता
हर दर्द यूं बेचने से , सरे-आम नहीं बिकता ...
अदाएँ बख्शी जाती है कुछ चुनिन्दा नज़रों को
बेबाक आँखों में ये जेवर का काम नहीं टिकता
दिल पे लिखी जाती है मोहब्बत की सब इबारतें हथेलियाँ कुरेदने से उनपे कोई नाम नहीं दिखता

Mar 31

तुझे पाने की जिद

anjaan pathik Posted by: anjaan pathik in हिंदी कविता | Comments
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इस इश्क के बाजार में हर् सांस गिरवी रख दूँ ,
फिर भी जो दाम कम हों,तो खुद को बेच डालूँ
मुनाफा है या घाटा ,ये भी कभी न सोचूँ
तू है ,तेरा एहसास या ,जो भी मिले वो पा लूँ ....||

Mar 31

आगाज़....

anjaan pathik Posted by: anjaan pathik in Administrator's Blog | Comments
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मेरी धडकनें बन जायें अगर कागज़ कभी
अपनी सांस सांस को मासूम कलम मैं बना लूँ
तेरी स्याही में यूँ डूबूँ,
कि जो भी लिखूं,
वो तेरा अक्स हो तुझे लफ्ज़ में सजाकर ,
खुद के मायने मैं पा लूँ ...||

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