वहीं नजर आया
cypress

द्वापर में भादों के महीने में
काली अंधेरी रात में
जन्म लिया कान्हा ने
मथुरा में कारागार के कक्ष में |
था दिवस चमत्कारी
सारे बंधन टूट गए
द्वार के ताले स्वतः खुले
जाने का मार्ग प्रशस्त हुआ |
बेटे को बचाने के लिए
गोकुल जाने के लिए
वासुदेव ने जैसे ही
जल में पैर धरा
जमुना की श्रद्धा ऐसी जागी
बाढ आ गई नदिया में |
बाहर पैर आते ही
कान्हा के पैरों को पखारा
जैसें ही छू पाया उन्हें
अद्भुद शान्ति छाई जल में |
सारा गोकुल धन्य हो गया
कान्हा को पा बाहों में
गोपिया खो गईं
मुरली की मधुर धुन में |
बंधीं प्रेम पाश में उसके
रम कर रह गईं उसी में
ज्ञान उद्धव का धरा रह गया
उन को समझाने में |
वे नहीं जानती थीं उद्देश्य
कृष्ण के जाने का
कंस के अत्याचारों से
सब को बचाने का |
अंत कंस का हुआ
सुखी समृद्ध राज्य हुआ
कौरव पांडव विवाद मैं
मध्यस्थ बने सहायता की |
सच्चाई का साथ दिया
युद्ध से विचलित अर्जुन को
गीता का उपदेश दिया
आज भी है महत्त्व जिसका |
जन्म दिन कान्हा का
हर साल मनाते हैं
श्रद्धा से भर उठाते हैं
जन्माष्टमी मनाते हैं |
आशा
मेरी बैरी ना थीं
मैं आज भी तुम्हें
अपना शत्रु नहीं मानता |
ऐसा क्या हुआ कि
अब पीछे से वार करती हो
कहीं दुश्मन से तो
हाथ नहीं मिला बैठी हो |
वार ही यदि करना है
पीछे से नहीं सामने से करो
पर पहले सच्चाई जान लो
दृष्टि उस पर डाल लो |
कोई लाभ नहीं होगा
अन्धेरे में तीर चलाने से
मेरे समीप आओ
मुझे समझने का यत्न करो |
मेरे पास बैठो
मैं अभी भी ना
समझ पाया हूं तुम्हें
क्यूँ दुखों का सामान
इकट्ठा करती हो |
मेरी भावनाओं से खेलती हो
बिना बात नाराज होती हो
कुछ तो बात को समझो
अभी भी देर नहीं हुई है |
आओ दिल की बात करो
बैमनस्य दूर करने के लिए
सामंजस्य स्थापित करने के लिए
कुछ तो मुझसे कहो |
ह्रदय पर रखा हुआ बोझ
कुछ तो कम होगा
जब सच्चाई जान जाओगी
मुझे समझ पाओगी
तभी शांति का अनुभव होगा|
आशा