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A SHORT DESCRIPTION ABOUT YOUR BLOG
Mar 04

परिवर्तन मौसम का

asha Posted by: asha in Uncategorized | Comments
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परिवर्तन मौसम का

सर्दी का अहसास लिए सोए थे 
पौ फटे जब नींद खुली 
आलस था खुमारी थी 
जैसे ही कदम नीचे रखे 
दी दस्तक ठिठुरन ने
घर के कौने कौने में 
सोचा न था होगा परिवर्तन 
इतने  से अंतराल में 
हाथों में पानी लेते ही 
कपकपी होने लगी 
गर्म प्याली चाय की 
दवा रामबाण नजर आई 
जल्दी से स्वेटर पहना 
कुछ तो गर्मी आई 
खिडकी से बाहर झांका 
समय रुका नहीं था 
थी वही गहमागहमी
बस  जलता अलाव चौरस्ते पर 
कुछ लोगों में बच्चे भी थे 
जो अलाव ताप रहे थे 
थे पूर्ण अलमस्त 
हसते थे हंसा रहे थे 
खुशियों से महरूम नहीं 
 किसी मौसम का प्रभाव नहीं 
जीने का नया अंदाज
वहीं   नजर आया 
सारी  उलझनें सारी कठिनाई 
अलाव में भस्म हो गईं
थी केवल मस्ती और शरारतें 
कर लिया था सामंजस्य 
प्रकृति में  होते परिवर्तन से |
काश हम भी उनसे हो पाते 
तब नए अंदाज में नजर आते |
|
आशा
Mar 02

परिंदा

asha Posted by: asha in Uncategorized | Comments
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बेबस  सा परकटा परिंदा

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Feb 14

दिया गुलाब का फूल

asha Posted by: asha in Uncategorized | Comments
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दिया गुलाब का फूल
किया इज़हार प्यार का
डायरी में रखा
बहुत दिन तक सहेजा
एक दिन डायरी हाथ लगी
नजर उस पर पड़ी
फूल तो सूख गया 
पर सुगंध अपनी छोड़ गया
अहसास उन भावनाओं का
उसे भूलने नहीं देता
याद जब भी आ जाती
भीनी सी उस खुशबू में
जाने कब खो जाती है
उन यादों के खजाने से
मन को धनी कर जाती है
फिजा़ओं में घुली
यादों की सुगंध
उसको छू जो आई
आज भी हवा में घुली
धीरे धीरे धीमें से
उस तक आ ही जाती है
कागज़ कोरा अधूरा
रहा भी तो क्या
सुगंध अभी तक बाकी है
उसी में रच बस गयी है
दिल में जगह काफी़ है |
Dec 09

प्रभाव परिवर्तन का

asha Posted by: asha in हिंदी कविता | Comments
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अकारण कोई नहीं अपनाता
मन शंकाओं से भरता जाता
यह  परिवर्तन हुआ कैसे
छोर नजर नहीं आता
फिर भी परेशान नहीं हूँ
खोजना चाहती हूँ उसे
जो है असली कारक और कारण
इस होते परिवर्तन का
क्या देखा उसने ऐसा
जो खिचा चला आया
बिना जाने अपनापन जताया
कहीं से रिश्ता भी खोज लाया
वह कितना सही कितना गलत
यह तो नहीं मालूम
पर लगता कोई गहरा छिपा राज
अचानक प्रेम उमढने में
कहीं कोई धोखा तो नहीं
जो छल करे मेरे अनजाने में
मेरी ममता से भरे जीवन में
मुझे  कोई भी परिवर्तन
रास  नहीं आता
समाधान  मन की शंका का
हो नहीं पाता|
आशा
Sep 17

love song

asha Posted by: asha in Uncategorized | Comments
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Someone sang
The love song
long waited
Caught the moment
  He first dated
It thrilled and excited
He became rest less
Could not control
The emotions
Peeping through
 The inner most
Corner of the heart
So set in a cart
Went there to see
His sweet heart
But could not
Nobody was there
Either it was imagination
Or hallucination.
Sep 16

सुखद

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Aug 28

Oh you blue eyed

asha Posted by: asha in English Poems | Comments
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cypress

Oh you blue eyed
You look  pretty
Graceful and gorgeous
No one can surpass you.
Your eyes are heart piercing
Being  blue and catching
Can attract a person
To look at   them
fills the heart with  joy  .
Beats  increase
They can‘t be measured
Or expressed in words
When  the mother
watches  you playing  .
For her  to hug
such a baby is
A joy  for ever.
Asha
Jul 21

Poem on Love in English - Love

asha Posted by: asha in Uncategorized | Comments
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Jul 20

Love

asha Posted by: asha in Uncategorized | Comments
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Emotional feeling as a whole
 Coming from
Inner most corner of heart 
Is a gift of God?
And is voice of soul
So deeply rooted
Depth can never be measured
Cupid the god of love
A matchless beauty
With powered wings
Can fly any where
But can’t see as being blind
That is why love is so
It can fly with swing
To hear the melody
Of love bell’s ring 
It is like  a mirage
When chased
It   vanishes
Is it magic done to attract?
Magic is never true
Love is neither mirage
Nor a magic
But  an emotion of heart  .
Asha
Jul 17

ओस की बूँद पर कविता - ओस की एक बूँद

asha Posted by: asha in हिंदी कविता | Comments
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Jul 01

अवनि अवनि हरा लिबास और सुंदर मुखड़ा जैसे हो धरती का टुकड़ा नीली नीली प्यारी आँखें झील सी गहराई उनमें मैं देखता ऐसा लगता जैसे झील किसी से करती बातें हँसी तेरी है झरने जैसी चाल तेरी है नदिया जैसी मंद हवा सा हिलता आँचल अवनि सा दिल तुझे दे गया मुझको अपने साथ

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अवनि

हरा लिबास और सुंदर मुखड़ा
जैसे हो धरती का टुकड़ा
नीली नीली प्यारी आँखें
झील सी गहराई उनमें
मैं देखता ऐसा लगता
जैसे झील किसी से करती बातें
हँसी तेरी है झरने जैसी
चाल तेरी है नदिया जैसी
मंद हवा सा हिलता आँचल
अवनि सा दिल तुझे दे गया
मुझको अपने साथ ले गया !

 

आशा
Jun 26

Ever green

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She tells a lie 
That she is not mine 
She is hard  a bit 
but not I 
Though I feel shy 
Some times I too cry 
"no you are a lier
You are not fire "
She laughs at me 
and says 
all the time not 
but for a moment
she is really the same 
as I think .
She is my dearest  
ever green and  loveliest
 Mother  to  whom
 I miss too much
Asha
Jun 24

तुम हो एक सौदागर

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तुम हो एक सौदागर ,
अपने व्यक्तित्व से लुभाते हो ,
अनजाने में कभी कभी ,
बातों को हवा देते थे |
भावनाओं को उभार कर ,
मन मस्तिष्क पर छाते गए ,
फिर कहीं चले गए ,
दर्द अजीब सा दे गए ,
नाम ह्रदय पर लिख गए |
यही सब यदि करना था ,
भुलाने की कोई विधि ,
तो बता कर जाते ,
या विस्मृति की ,
दवा ही दे जाते |
कभी किसी बात को ,
अधिक ही उछाल देते थे ,
पर किसी ने न जाना ,
कि तुम बेवफा थे |
तस्वीर जो दी तुमने ,
चैन से जीने नहीं देती ,
बहुत बेचैन करती है ,
अतीत याद दिलाती है |
लोग तुमसे जोड़ कर ,
मेरानाम तक लेने लगे,
जाने क्यूं ऐसा कहने लगे |
याद तो उन्हें किया जाता है ,
जो प्यार करते हों ,
या इस दुनिया में,
अपना नाम कर गए हों |
जी चाहता है ,
कहीं तुम मिल जाओ ,
मेरी भावनाओं को,
फिर से रंग जाओ
इन्तजार न रहे,
ऐसा कुछ कर जाओ |
कहां तक सोचूं तुम्हारे लिए ,
कई ऋतुएं बीत गईं ,
अब तो लगता है ,
हर मौसम भी हरजाई |
आशा
May 20

एक मोहरा

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May 11

Mother dear

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May 09

माँ

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ममता का कोई मोल नहीं होता ,
हतभागा है वह
जो इसे खो देता ,
माँ की ममता का
 कोई नहीं सानी ,
उसकी ममता है अथाह
नहीं मैं अनजानी ,
उसके प्यार की थपकी ,
मुझे जब भी
याद आ जाती हैं ,
आँखें नम हो जाती हैं ,
माँ की याद दिलाती हैं |
आशा 
May 04

प्रकृति से

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हरी भरी बगिया में देखा ,
रंग बिरंगे फूल खिले ,
हरियाली छाई पेड़ों पर ,
फले फूले और खूब सजे ,
तरह-तरह के पक्षी आये ,
उन पेड़ों पर नीड़ बनाए ,
पर इक छोटी सी चिड़िया ,
आकृष्ट करे पंख फैलाये,
उसकी मीठी सी स्वर लहरी ,
जब भी कानों में पड़ जाये ,
एक अजीब सा सम्मोहन ,
उस ओर बरबस खींच लाये,
चूंचूं चूंचूं चींचीं चींचीं ,
चूंचूं चींचीं करती चिड़िया ,
इस डाल से उस डाल तक ,
पंख फैला कर उड़ती चिड़िया,
दाना पानी की तलाश में ,
बहुत दूर तक जाती चिड़िया ,
फिर पानी की तलाश में ,
नल कूप तक आती चिड़िया ,
जल स्त्रोत तक आना उसका ,
चोंच लगा नल की टोंटी से ,
बूँद-बूँद जल पीना उसका ,
मुझको अच्छा लगता है ,
घंटों बैठी उसे निहारूँ ,
ऐसा मुझको लगता है ,
मुझको आकर्षित करता है |
तिनका-तिनका चुन कर उसने ,
छोटा सा अपना नीड़ बनाया ,
उसी नीड़ में सुख से रहती ,
अपने चूजों को दाना देती ,
उसका समर्पण देख- देख कर ,
अपना घर याद आने लगता है ,
बच्चों की चिंता होती है ,
मन अस्थिर होने लगता है ,
कैसे घर समय पर पहुँचूँ ,
चिंता मुझको होती है ,
जब घर पहुँच जाती हूँ ,
तभी शांत मन हो पाता है ,
चिड़िया की मेहनत और समर्पण ,
बार-बार याद आते हैं ,
उसको देख बिताए वे पल ,
यादगार क्षण बन जाते हैं |
आशा
May 03

खुली किताब का एक पन्ना

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चहरे पर भाव सहज आते नहीं किसी को बहकाते न कोई बात छिपी उससे निश्छल मन का दर्पण है वह सूर्य किरण की आभा सा है मुखड़ा उसका ख़ुली किताब के पन्ने सा |
सुरमई आँखों की कोरों में न कोई अवसाद छुपा है न ही विशद आंसुओं की लड़ी है केवल हँसी भरी है उन कजरारी अँखियों में मन चंचल करती अदाओं में ।
है अंकित एक-एक शब्द मन की किताब के पन्नों में उनको समेटा सहेजा है हर साँस से हर शब्द में वही चेहरा दीखता है खुली किताब के पन्ने सा |
यदि पढ़ने वाली आँख न हो कोई पन्ना खुला रहा तो क्या मन ने क्या सोचा क्या चाहा इसका हिसाब रखा किसने इस जीवन की आपाधापी में पढ़ने का समय मिला किसको पढ़ लिया होता यदि इस पन्ने को खिल उठता गुलाब सा मन उसका है मन उसका ख़ुली किताब के पन्ने सा |

आशा
Apr 26

श्री कृष्ण भगवान् पर जन्माष्टमी पर कविता - कान्हा

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जन्माष्टमी  पर कविता

द्वापर में भादों के महीने में

काली अंधेरी रात में

जन्म लिया कान्हा ने

मथुरा में कारागार के कक्ष में |

था दिवस चमत्कारी

सारे बंधन टूट गए

द्वार के ताले स्वतः खुले

जाने का मार्ग प्रशस्त हुआ |

बेटे को बचाने के लिए
गोकुल जाने के लिए

वासुदेव ने जैसे ही

जल में पैर धरा
जमुना की श्रद्धा ऐसी जागी

बाढ आ गई नदिया में |

बाहर पैर आते ही

कान्हा के पैरों को पखारा

जैसें ही छू पाया उन्हें

अद्भुद शान्ति छाई जल में |

सारा गोकुल धन्य हो गया

कान्हा को पा बाहों में

गोपिया खो गईं

मुरली की मधुर धुन में |

बंधीं प्रेम पाश में उसके

रम कर रह गईं उसी में

ज्ञान उद्धव का धरा रह गया

उन को समझाने में |

वे नहीं जानती थीं उद्देश्य

कृष्ण के जाने का

कंस के अत्याचारों से

सब को बचाने का |

अंत कंस का हुआ

सुखी समृद्ध राज्य हुआ

कौरव पांडव विवाद मैं

मध्यस्थ बने सहायता की |

सच्चाई का साथ दिया

युद्ध से विचलित अर्जुन को

गीता का उपदेश दिया

आज भी है महत्त्व जिसका |

जन्म दिन कान्हा का

हर साल मनाते हैं

श्रद्धा से भर उठाते हैं

जन्माष्टमी मनाते हैं |

आशा

Apr 25

दुल्हन पर कविता - एक दुलहन

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Apr 11

Was it not amazing

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Was it not amazing
 To see you in the toy train
Waving a flag
So excited watching
 The flag in your hand
Wishing   to ride on it
But could not
Because there was
No stoppage there  
It slowed down
But not stopped
I saw it spellbound
Repenting for that
Which   I could not do
Oh why could not I
It was so sad
That I could not
Sleep to night
In dreams always
I watch myself
In place of you
Waving the flag
Roaming in it . 
Asha 
Apr 09

What a Fine day

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what a fine day
with full of colors
scattered 
here and there 
sound of songs 
in church
becomes a bit loud
The bell rings 
children welcome 
Santa  with  a bag 
full of gifts 
all say  happy x-mas
to you  . 
Asha
Apr 07

पहले तुम ऐसी न थीं

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पहले तुम ऐसी न थीं ,

पहले तुम ऐसी ना थीं

मेरी बैरी ना थीं
मैं आज भी तुम्हें
अपना शत्रु नहीं मानता |
ऐसा क्या हुआ कि
अब पीछे से वार करती हो
कहीं दुश्मन से तो
हाथ नहीं मिला बैठी हो |
वार ही यदि करना है
पीछे से नहीं सामने से करो
पर पहले सच्चाई जान लो
दृष्टि उस पर डाल लो |
कोई लाभ नहीं होगा
अन्धेरे में तीर चलाने से
मेरे समीप आओ
मुझे समझने का यत्न करो |
मेरे पास बैठो
मैं अभी भी ना
समझ पाया हूं तुम्हें
क्यूँ दुखों का सामान
इकट्ठा करती हो |
मेरी भावनाओं से खेलती हो
बिना बात नाराज होती हो
कुछ तो बात को समझो
अभी भी देर नहीं हुई है |
आओ दिल की बात करो
बैमनस्य दूर करने के लिए
सामंजस्य स्थापित करने के लिए
कुछ तो मुझसे कहो |
ह्रदय पर रखा हुआ बोझ
कुछ तो कम होगा
जब सच्चाई जान जाओगी
मुझे समझ पाओगी
तभी शांति का अनुभव होगा|

आशा

Apr 04

मन का सुख

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पंख लगा अपनी बाँहों में
मन चाहे उड़ जाऊँ मैं
सहज चुनूँ अपनी मंजिल
झूलों पर पेंग बढ़ाऊँ मैं|
भाँति-भाँति के सपनों में
चुन-चुन कर प्यारे रंग भरूँ
हरा रंग ले सब पर डालूँ
हरियाली सी छा जाऊँ मैं |
प्यारे-प्यारे फूल चुनूँ
गुलदस्ता एक बनाऊँ मैं
अनेकता में एकता का
सच्चा रूप दिखाऊँ मैं |
जब जी चाहे उसको देखें
खुशबू से मन उनका महके
नन्हों की वह ख़ुशी देख कर
ममता से दुलराऊँ मैं|
जात पाँत और रंग भेद
से दूर बहुत वे सरल सहज
और निश्चछल निर्मल
उन पर अपना स्नेह लुटाऊँ
मन का सुख पा जाऊँ मैं |
बच्चों में मैं बच्चा बन कर सब से नेह बढ़ाऊँ मैं
खुले व्योम के उस कोने में
अपनी मंज़िल पाऊँ मैं |
पंख लगा अपनी बाँहों में
एक परी बन जाऊँ मैं
उनको सदा विहँसता देखूँ
सारे सुख पा जाऊँ मैं |
आशा
Apr 03

झीना आवरण - हिंदी कविता

asha Posted by: asha in Uncategorized | Comments
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झीना आवरण

वे व्यस्त नजर आते 
जीवन की आपाधापी मे 
अभ्यस्त  नजर आते 
मनोभाव छिपाने में 
आवरण से ढके 
सत्य स्वीकारते नहीं 
झूट हजारों के
सत्य स्वीकारते नहीं
हर वार से बचना चाहते
ढाल साथ रखते
व्यंग वाणों से बचने के लिए सीधे बने रहने के लिए
यह तक भूल जाते
है आवरण बहुत झीना
जाने कब हट जाए
हवा के किसी  झोंके से कितना क्या प्रभाव होगा
जब बेनकाब चेहरा होगा
सोचना नहीं चाहते
बस यूं  ही जिये जाते अनावृत होते ही
जो कुछ भी दिखाई देगा
होगी फिर जो प्रतिक्रया
वह कैसे सहन होगी
है वर्तमान की सारी महिमा
कल को किसने देखा है
बस यही है अवधारणा
मनोभाव छिपाने की |
आशा

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