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Category >> शायरी
Apr 03

ग़ज़ल(क्या खोया और क्या पाया)

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ग़ज़ल(क्या खोया और क्या पाया)


अँधेरे में रहा करता है साया साथ अपने पर बिना

जोखिम उजाले में है रह पाना बहुत मुश्किल 


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Jan 02

ग़ज़ल ( प्यारे पापा डैड हो गए )

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ग़ज़ल ( प्यारे पापा डैड हो गए )


माता मम्मी अम्मा कहकर बच्चे प्यार जताते थे




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Jan 02

ग़ज़ल (ये रिश्तें)

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ग़ज़ल (ये रिश्तें)

ये रिश्तें काँच से नाजुक जरा सी चोट पर टूटे
बिना रिश्तों के क्या जीवन ,रिश्तों को संभालों तुम

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Dec 16

ग़ज़ल ( कैसे कैसे रँग)

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ग़ज़ल ( कैसे कैसे रँग)

कभी अपनों से अनबन है कभी गैरों से अपनापन
दिखाए कैसे कैसे रँग मुझे अब आज जीबन है

ना रिश्तों की ही कीमत है ना नातें अहमियत रखतें
रिश्तें हैं उसी से आज जिससे मिल सके धन है

सियासत में नहीं  युबा , बुढ़ापा काम पाता है
समय ये आ गया कैसा दिल में आज उलझन है

सच्ची बात किसको आज सुनना अच्छी लगती है
सच्ची  बात सुनने को ब्याकुल अब हुआ मन है

जीबन के सफ़र में जो मुसीबत में भी अपना हो
मदन साँसें जिंदगी मेरी  उसको ही समर्पन है
प्रस्तुति :
मदन मोहन सक्सेना



Nov 29

गज़ल ( अहसास)

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गज़ल ( अहसास)

हर इंसान के जीवन में ,ऐसे कुछ अहसास होते हैं
भले मुद्दत गुजर जाये , बे दिल के पास होते हैं

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Nov 21

ग़ज़ल (ज़माने की हकीकत)

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ग़ज़ल (ज़माने की हकीकत)

दुनिया में जिधर देखो हजारो रास्ते दीखते
मंजिल जिनसे मिल जाए बह रास्ते नहीं मिलते

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Nov 13

ग़ज़ल (जग की रीत)

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ग़ज़ल (जग की रीत)
पाने को आतुर रहतें हैं खोने को तैयार नहीं है
जिम्मेदारी ने मुहँ मोड़ा ,सुबिधाओं की जीत हो रही
साझा करने को ना मिलता , अपने गम में ग़मगीन हैं
स्वार्थ दिखा जिसमें भी यारों उससे केवल प्रीत हो रही
कहने का मतलब होता था ,अब ये बात पुरानी है
जैसा देखा बैसी बातें .जग की अब ये रीत हो रही
अब खेलों में है राजनीति और राजनीति ब्यापार हुई
मुश्किल अब है मालूम होना ,किस से किसकी मीत हो रही
क्यों अनजानापन लगता है अब, खुद के आज बसेरे में
संग साथ की हार हुई और तन्हाई की जीत हो रही
ग़ज़ल प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना

Nov 12

मुक्कद्दर आज रूठा है

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जुदा हो करके के तुमसे अब ,तुम्हारी याद आती है
मेरे दिलबर तेरी सूरत ही मुझको रास आती है

कहूं कैसे मैं ये तुमसे बहुत मुश्किल गुजरा है
भरी दुनियां में बिन तेरे नहीं कोई सहारा है

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Nov 07

ऐसे कुछ अहसास

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ऐसे कुछ अहसास

ऐसे कुछ अहसास होते हैं हर इंसान के जीवन में
भले मुद्दत गुजर जाये , बे दिल के पास होते हैं

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Nov 04

ग़ज़ल (दीवारें ही दीवारें )

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दीवारें ही दीवारें नहीं दीखते अब घर यारों
बड़े शहरों के हालात कैसे आज बदले है.
उलझन आज दिल में है कैसी आज मुश्किल है
समय बदला, जगह बदली क्यों रिश्तें आज बदले हैं
जिसे देखो बही क्यों आज मायूसी में रहता है
दुश्मन दोस्त रंग अपना, समय पर आज बदले हैं
जीवन के सफ़र में जो पाया है सहेजा है
खोया है उसी की चाह में ,ये दिल क्यों मचले है
समय ये आ गया कैसा कि मिलता अब समय ना है
रिश्तों को निभाने के अब हालात बदले हैं













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Oct 15

कुछ शेर

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कुछ शेर

 

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Oct 08

ग़ज़ल (कुर्सी और वोट) )

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ग़ज़ल (कुर्सी और वोट)
कुर्सी और वोट की खातिर काट काट के सूबे बनते
नेताओं के जाने कैसे कैसे , अब ब्यबहार हुए
दिल्ली में कोई भूखा बैठा, कोई अनशन पर बैठ गया
भूख किसे कहतें हैं नेता उससे अब दो चार हुए नेता क्या अभिनेता क्या अफसर हो या साधू जी
पग धरते ही जेल के अन्दर सब के सब बीमार हुए
कैसा दौर चला है यारों गंदी हो गयी राजनीती अब
अमन चैन से रहने बाले दंगे से दो चार हुए
दादी को नहीं दबा मिली और मुन्ने का भी दूध खत्म
कर्फ्यू में मौका परस्त को लाखों के ब्यापार हुए
तिल का ताड़ बना डाला क्यों आज सियासतदारों ने
आज बापू तेरे देश में, कैसे -कैसे अत्याचार हुए
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई आपस में सब भाई भाई
ख्बाजा साईं के घर में , ये बातें क्यों बेकार हुए
ग़ज़ल प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना

Oct 07

ग़ज़ल (सत्ता की जुगलबंदी)

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सत्ता की जुगलबंदी

कैसी सोच अपनी है किधर हम जा रहें यारों
गर कोई देखना चाहें बतन मेरे बो आ जाये

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Sep 30

ग़ज़ल (बोल)

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Sep 23

ग़ज़ल (ये कैसा परिवार हुआ)

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ग़ज़ल (ये कैसा परिवार हुआ)

 

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Sep 17

ग़ज़ल (सेक्युलर कम्युनल)

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जब से बेटे जबान हो गए
मुश्किल में क्यों प्राण हो गए

किस्से सुन सुन के संतों के
भगवन भी हैरान हो गए

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Sep 13

मर्ज ऐ इश्क

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वक़्त की साजिश समझ कर, सब्र करना सीखियें
दर्द से ग़मगीन वक़्त यू ही गुजर जाता है


जीने का नजरिया तो, मालूम है उसी को बस
अपना गम भुलाकर जो हमेशा मुस्कराता है



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Aug 20

ग़ज़ल (ये कल की बात है )

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ग़ज़ल (ये कल की बात है )

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Jul 23

ग़ज़ल(ये कल की बात है )

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 ग़ज़ल(ये कल की बात है )

 

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Jul 02

ग़ज़ल(शून्यता)

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जिसे चाहा उसे छीना , जो पाया है सहेजा है
उम्र बीती है लेने में ,मगर फिर शून्यता क्यों हैं

सभी पाने को आतुर हैं ,नहीं कोई चाहता देना
देने में ख़ुशी जो है, कोई बिरला सीखता क्यों है

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Jun 05

ग़ज़ल (जग की रीत)

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ग़ज़ल (जग की रीत)

पाने को आतुर रहतें हैं खोने को तैयार नहीं है
जिम्मेदारी ने मुहँ मोड़ा ,सुबिधाओं की जीत हो रही

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May 30

ग़ज़ल(ये कैसा परिवार हुआ.)

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ग़ज़ल(ये कैसा परिवार हुआ)



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May 28

ग़ज़ल (हकीक़त)

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ग़ज़ल (हकीक़त)

चेहरे की हकीक़त को समझ जाओ तो अच्छा है
तन्हाई के आलम में ये अक्सर बदल जाता है

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May 14

ग़ज़ल (जालिम दुनिया)

Madans Posted by: Madans in शायरी | Comments
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ग़ज़ल ((जालिम दुनिया))




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May 10

ग़ज़ल (दिल के पास)

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ग़ज़ल (दिल के पास)




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May 07

ग़ज़ल

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May 05

dosti..

Dr.Sweet Angel Posted by: Dr.Sweet Angel in शायरी | Comments
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दोस्ती रूह,दोस्ती  खुदा और  इश्क  की शुरुवात  है 

दोस्ती मंदिर  ,मस्जिद और मुहब्बत  का आगाज़ है 

Apr 08

ग़ज़ल(दीवारें ही दीवारें)

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दीवारें ही दीवारें नहीं दीखते अब घर यारों
बड़े शहरों के हालात कैसे आज बदले है.

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Apr 03

ग़ज़ल

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दिल के पास हैं लेकिन निगाहों से बह ओझल हैं
क्यों असुओं से भिगोने का है खेल जिंदगी। 


जिनके साथ रहना हैं ,नहीं मिलते क्यों दिल उनसे
खट्टी मीठी यादों को संजोने का है खेल जिंदगी।


किसी के खो गए अपने, किसी ने पा लिए सपनें
क्या पाने और खोने का है खेल जिंदगी।


उम्र बीती और ढोया है, सांसों के जनाजे को
जीवन सफर में हँसने रोने का
है  खेल जिंदगी।
किसी को मिल गयी दौलत, कोई तो पा गया शोहरत
मदन बोले , काटने और बोने का ये खेल जिंदगी।

ग़ज़ल प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना
Mar 25

ग़ज़ल

Madans Posted by: Madans in शायरी | Comments
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सोचकर हैरान हैं  हम , क्या हमें अब हो गया है
चैन अब दिल को नहीं है ,नींद क्यों  आती नहीं है

बादियों में भी गये  हम ,शायद आ जाये सुकून
याद उनकी अब हमारे दिल से क्यों  जाती नहीं है

हाल क्या है आज अपना ,कुछ खबर हमको नहीं है देखकर मेरी ये हालत  , तरस क्यों खाती नहीं है

हाल क्या है आज उनका ,क्या याद उनको है हमारी किस तरह कैसे कहें हम  मिलती हमें पाती नहीं है 
चार पल की जिंदगी लग रही सदियों की माफ़िक
चार पल की जिंदगी क्यों  बीत अब जाती नहीं है 
किस तरह कह दे मदन जो बात उन तक पहुंच जाये
बात अपने दिल की क्यों  अब लिखी जाती नहीं है

 
ग़ज़ल :
मदन मोहन सक्सेना

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