हर दिन पिता याद आते हैं... पग थमते, कर जुड़ जाते हैं फल साफल्य चखाए तुमने. जब-जब मन कोशिश कर हारा- नित घर-घाट दिखाए तुमने. अक्षर-शब्द सिखाये तुमने.*
हर दिन पिता याद आते हैं... अब न गोद में बिठलाते हैं. कर न दर्द की कभी नुमाइश. ले पहचान गैर-अपनों को- कर न सकूँ इनकी पैमाइश. लाड, डांट, झिडकी, समझाइश.* हर दिन पिता याद आते हैं... पर मिथ्या सपने भाते हैं. हम अपने ही हाथ मलेंगे. आँख खुलेगी तो उदास हो- यादों में आ, गले लगेंगे. जान रहे हम अब न मिलेंगे.