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भूले बिसरे कवि, साहित्यकार सुकविमनीषी-पं० जगदम्बा प्रसाद मिश्र 'हितेषी' पर शोध लेख PDF Print Write e-mail
Hindi Corner - Vichaar
Wednesday, 28 September 2011 17:31


शहीदों की चिताओं पर जुड़ेगें हर बरस मेले , वतन पर मरने वालों का यहीं बाकी निशां होगा | -'हितैषी'

परिचय :

जिनकी वाणी में प्राणों की वंशी के रंध्र-रंध्र में फूंक भर कर नवजीवन जगा देने वाली संजीवनी थी,जिनकी हुनकर में दिग्गज अंग्रेजो के पाषण हृदय को दहला देने की शक्ति थी , जिनकी पुकार पर देश के कोने कोने से लक्ष-लक्ष युवा पराधीन भारतमाता की बेड़ियों को काटने के लिए सर्वस्व समर्पण हेतु मचल उठते थे | ऐसे प्रखर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी  सुकविमनीषी ,सवैया-सम्राट पं० जगदम्बा प्रसाद मिश्र 'हितैषी' जी का जन्म कान्यकुब्ज आंकिन के मिश्र पं० रामचंद्र मिश्र के घर मार्ग शीर्ष  शुक्ल एकादशी संवत १९५२ विक्रमी तदनुसार १२ नवंबर १८९५ ई० को गंजमुरादाबाद जनपद उन्नाव(उ०प्र०) में हुआ था |


जन्म-मार्गशीर्ष सम्वत १९५२ वि०                                                  निर्वाण-फाल्गुन शुक्ल
(१२ नवम्बर ४८९५) शनिवार ,गंजमुरादाबाद उन्नाव(उ०प्र०)               दशमी सम्वत २०१३ वि० ११ मार्च १९५७ सोमवार कानपुर

शिक्षा:
उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा मौलवी साहब से फारसी में प्राप्त की और प्रारम्भिक विद्यालय में कक्षा ४ तक उर्दू का अध्ययन किया | तदुपरांत कानपुर के गुरुनारायण खत्री स्कूल में कक्षा सात तक अंग्रेजी की शिक्षा प्राप्त की | बहुमुखी प्रतिभा के धनी हितैषी जी ने बाद में स्वाध्याय द्वारा गुजराती ,संस्कृत ,बंगला तथा हिन्दी का गहन अध्ययन किया| कविता लेखन की प्रेरणा ,उन्हें पितामही राधादेवी, जो उनसे नित्य सूरसागर तथा रामायण सुनाया करती थी ,उनसे मिली |

स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय होने की पीठिका :

उनके पितामह पं० बाजीलाल मिश्र भगवंत नगर मल्लावां जनपद हरदोई के चकलेदार थे |जिनका बसाया हुआ मोहल्ला बाजीगंज आज भी है | प्रथम स्वाधीनता संग्राम में उनके पितामह बाजीलाल तथा प्रपितामह रमानाथ मिश्र ने अंग्रेजों के विरुद्ध भारतमाता की वेदी पर अपने प्राणों की आहुति दी थी |अंग्रेजों से उत्पीड़ित होकर  उनका परिवार गंजमुरादाबाद में आकार बस गया था| बाद में कानपुर उनका मुख्य कार्य क्षेत्र बन गया |

स्वतंत्रता संघर्ष में हितैषी जी की भूमिका :
"चन्दन को किसने सुगंध लै सींच्यों, कबै सिंहन सिखायो गंज कुम्भन बिदारिबो ?" की उक्ति बाल्यकाल से ही उन पर पूर्णरूप से चरितार्थ होने लगी | उन्होंने अपने पुरखो की राह पर चलकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी  भूमिका निभाते हुए अपने युवाकाल के अनेक वर्ष कारागार में कठोर यातनाये सहते हुए बिताए |
एक ओर जहाँ वे क्रांतिकारियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजों के छक्के छुड़ा रहे थे ,वही दूसरी ओरअपने काव्यगुरू  आचार्य गयाप्रसाद  शुक्ल  'स्नेही' जो 'त्रिशूल' उपनाम से  ओजस्वी देशभक्ति  पूर्ण कविताएँ लिखते थे | ऐसी रचनाये दैनिक पत्रों में निरंतर छपती थी और देशवासियों को राष्ट्रप्रेम तथा समर्पण की प्रेरणा प्रदान करती थी |
१९१६ में कानपुर के 'भारतीय प्रेस' से प्रकाशित 'अमेरिका को स्वतंत्रता कैसे मिली' नामक पुस्तिका के अंतिम कवर पृष्ठ पर छपी उनकी निम्नलिखित पंक्तियाँ आजादी के दीवानों की कंठहार बन गयी |

वतन की आबरू का पास देखें कौन करता हैं ,
सुना है आज मकतल में हमारा इम्तहां होगा |
जुदा मत हो मेरे पहलू से ऐ दर्दे वतन हरगिज़ ,
न जाने बादे मुर्दन मैं कहाँ और तू कहाँ होगा |
इलाही वह भी दिन होगा जब अपना राज देखेंगे,
जब अपनी ही जमीं होगी और अपना आसमां होगा |
शहीदों की चिताओं पर जुडेंगे हर बरस मेले ,
वतन पर मरने वालों का यहीं बांकी निसां होगा |

चूँकि अमर शहीद पं० रामप्रसाद 'बिस्मिल' और अशफाकउल्ला खां को काकोरी कांड में फांसी की सजा मिली थी और ये दोनों भी शायर थे, अत: भ्रमवश कतिपय लेखक इन पंक्तियों के साथ श्रद्धा के नाते उनके नामो का भी उल्लेख कर देते है | किन्तु  'विशाल भारत' के संपादक स्व० बनारसी दास चतुर्वेदी ने रचनाकार के रूप में हितैषी जी के नाम की पुष्टि की है | साथ ही 'बिस्मिल' जी ने अपनी जेल में लिखी आत्मकथा के परिशिष्ट में उपरोक्त रचना का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया है कि ये पंक्तियाँ उन्हें रुचती थी, अत: कंठस्त थीं . उन्होंने इनका रचनाकार होने का कोई दावा नही किया|
मैनपुरी के क्रन्तिकारी पं० गेंदालाल दीक्षित कि संस्था 'मातृवेदी' की ओर से फौजी छावनियों में बांटने के लिए एक लाल पर्चा छपवाया गया था | संस्था के सदस्य के रूप में , एक ज्योतिषी के वेश में सन १९१७ में हितैषी जी उक्त पर्चा बांटते हुए बंदी बना लिए गए  थे | किन्तु हवालात से फरार होकर वे कलकत्ता पहुँच गए |
बंगाल में १९२१ के असहयोग आंदोलन में उन्हें ढेढ़ साल की सजा हुई | सन१९२३ में जब झंडा आंदोलन चला तब कानपुर के टाउनहाल पर राष्ट्रीय तिरंगा फहरा कर उन्होंने भारतमाता का जयघोष किया | फलत: ढाई साल का कारावास मिला |
वाजिद अली शाह की एक गजल पर स्व० गणेश शंकर विद्यार्थी जी ने हितैषी जी का ध्यान आकर्षित किया तो  'दरों दीवार पर हसरत से नज़र' करने के बजाय उन्होंनें लिखा -
"हम सरेंदार दसद शौवा जो घर करते है.
ऊन्चा सर कौम का हो नजरये सर करते है|
सूख जाये न कहीं पौधा ये आजादी का .
खून से अपने इसे इसलिए तर करते है |
इस गुलामी में खुशी हमको तो आई न नज़र .
खुश रहो अहले वतन हम तो सफ़र करते है |

कानपुर में राजनैतिक सभाओ ,जुलूसों पर रोक लगने पर उन्होंने गीता प्रवचन ,कथाओं के माध्यम से जनता को विद्रोह की प्रेरणा दी | विद्रोह के अभियोग में उनकी सारी चल-अचल सम्पति नीलाम कर दी गई थी | इस प्रकार १९१३ से १९३६ तक उन्होंने आजादी की लड़ाई में सक्रिय भागेदारी की |
निर्भीक क्रांतिदर्शी कवि:
उन्होंने गीता के 'न दैन्यम न पलायनम' के सिद्धांत को सर्वोपरि माना | शुभ्र खादी का धोती कुर्ता, सर पर ऊँची दीवार की गाँधी टोपी , आँखों पर चश्मा , मस्तक पर दो तीन रेखाएं तथा हाथ में मोटा डंडा उनकी पहचान थी |वे लोकमान्य तिलक ,मालवीय जी और श्री अरविन्द जी की विचारधारा के पोषक होते हुए भी गाँधी जी के आंदोलनों में भाग लेते रहे |
ओरछा ,धौलपुर तथा काला कांकर नरेशों के यहाँ उनका बड़ा सम्मान था , किन्तु संकट की स्थिति में  भी उन्होंने कभी याचना नहीं की |आर्थिक स्थिति सुधार के लिए उन्होंने लोहे का व्यापार भी किया |परन्तु उनका मानस चिंतन- निरंतर गतिमान रहा | स्वभाव से परम विनर्मी हितैषी जी 'हित' 'गवार' 'अलबेला' उपनामो से भी रचनाये करते थे |उनका काव्य भाषा प्रवाह ,काव्य चमत्कार गीतों की ऊँची उड़ान , सौष्ठव सहित प्रसाद गुण से परिपूर्ण है | 'वंदेमातरम' के उच्चारंपर प्रतिबन्ध लगाये जाने पर उन्होंने 'मातरिगीता' की रचना की थी |
'सरस्वती' के संपादक श्रीनारायण चतुर्वेदी  ने उन्हें सवैया सम्राट की पदवी दी थी |आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य के इतिहास में पृष्ठ ६६४ पर लिखा है "खड़ी बोली के कवित्तो में और सवैयों में हितैषी जी वही सरसता, वही  लचक  वही  भाव भंगीमा लाये है जो बृज भाषा में पाई
जाती हैं, शैली वही पुराने उस्तादो की हैं जिसमे वाग्घारा अंतिम वरण पर आकार चमक उठती है |"
काव्य संग्रह :
'नवोदिता' ,मार्त्गीता. 'कल्लोलिनी' वैकाली तथा 'दर्शाना' उनकी प्रकाशित कृतियाँ हैं |उमर खैय्याम की रुबाइयाँ का सरस काव्यानुवाद 'मधु मंदिर ' अप्रकाशित है |
निर्वाण:
११ मार्च १९५७ को कानपुर में उनका स्वर्गवास हुआ था |
प्रणम्य ,वरेण्य कीर्ति और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को उचित सम्मान एवं उनकी रचनाओ के संरक्षण के लिए अखिल भारतीय साहित्य परिषद् न्यास कृत संकल्प है |
अवनी से अम्बर तक गुंजित है जिनका जयनाद |
धन्य 'हितैषी' जन्मभूमि यह गंजमुरादाबाद ||

 

 

 

 

 

 

प्रवीण आर्य
अखिल भारतीय साहित्य परिषद्

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