| आज़ादी का झुनझुना |
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| Hindi Corner - Vyangya |
| Sunday, 14 August 2011 23:45 |
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अँग्रेज़ क्यों हमें इतनी बड़ी दुनिया में अकेला छोड़कर भाग गये इस संबंध में कई धारणाएँ प्रचलित हैं। एक धारणा है कि भारतीयों को अँग्रेज़ी सिखाना उन्हें भारी पड़ रहा था, उन्हें सिखाते-सिखाते अँग्रेज़ी की ही खटियाखड़ी होती जा रही थी। इसलिए, अपनी भाषा बचाने की गरज से सारे अँग्रेज़ भारत से भाग निकले। एक धारणा यह है कि अँग्रेज़ गाँधीजी की लाठी से डरकर भागे थे, और इसी के समानान्तर एक मत यह भी है कि वे गाँधीजी के ‘सत्य’ और ‘अंहिसा’ के सिद्धांत से घबराकर भागे। उनका सोचना था कि ‘लाठी’ और ‘अहिंसा’ के विरोधाभासी संबंध के बारे में गाँधीजी ‘सत्य’ का प्रकटीकरण नहीं कर रहे थे। उनके सिद्धांतकारों में यह आम राय बन चुकी थी कि गाँधीजी दिखाने भर के लिये अहिंसा-अहिंसा का राग आलापते हैं, दरअसल उनके इरादे नेक नहीं हैं, एक न एक दिन अवश्य ही पूरा देश अँग्रेज़ों पर ‘लठ’ लेकर पिल पड़ेगा। पिटने के डर से कौन बड़ा से बड़ा गुंडा जान बचाकर नहीं भागता ?अँग्रेज़ भी भाग गये। एक मत यह है कि अँग्रेज़ों को आभास हो चुका था कि आगामी राजनैतिक परिस्थितियाँ अपने बाप से नहीं सम्हलने वाली और देश में तेज़ी से फैलती जा रही विकट प्रजातांत्रिक चेतना का मुकाबला उनकी गोरी फौज से नहीं हो सकेगा। जनता से तो फिर भी वे लाठी-गोली की मदद से निपट लेंगे मगर सौ दो सौ राजनैतिक पार्टियों का मुकाबला आखिर वे क्या खाकर करेंगे। अँग्रेज़ दूरदृष्टि सम्पन्न तो थे ही, सन सैतालिस में ही उन्हें पता चल गया था कि भविष्य में भारत, लालू-राबड़ी, मोदियों-ठाकरों और, राजाओं, कलमाड़ियों, कनिमोझियों, रेड्डियों-येदीयुरप्पाओं का देश बनने जा रहा है। इसीलिए उन्होंने फालतू झँझट में न पड़कर आज़ादी का झुनझुना भारत की जनता को सौंप अपने मुल्क की और कूच कर दिया। हम चौसठ वर्षों से निरन्तर यह बेआवाज़ झुनझुना बजाए जा रहे हैं।
प्रमोद ताम्बट
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