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हिंदी हास्य व्यंग्य - एयर इंडिया घोटाले पर फ़ुल्फ़ुल पटेल जी से चर्चा PDF Print Write e-mail
Hindi Corner - Vyangya
Wednesday, 14 September 2011 09:41


नुक्क्ड़ पर हमने भाई सोहन शर्मा उर्फ़ कांग्रेसी को घेरा- " शर्मा जी ये एयर इंडिया घोटाला का क्या मामला है"। शर्मा जी बोले- "पटेल जी विमानन मंत्री थे, मेरे साथ हैं, वे बतायेंगे"। पटेल जी बोले -" भाजपा सरकार के समय ही एयर इंडिया की  हालत खस्ता थी, विमान बीस साल पुराने थे, कंपनी कर्ज में डूबी हुयी थी। देश की इज्जत का सवाल था, सो हमने फ़ैसला किया कि नये विमान खरीद कर इसे नयी जिंदगी दी जाये"। हमने कहा - "   कुछ जहाज ही बीस साल पुराने थे और कंपनी के उपर केवल 29 करोड़ का कर्ज था"। पटेल जी बोले - "जहाज खरीदने का फ़ैसला भाजपा सरकार का था"।

हमने कहा - " उसने केवल 25 जहाज खरीदने का फ़ैसला किया था तो आपने 111 कैसे ले लिये"। पटेल जी बोले - " यह निर्णय हमारा नहीं एयर इंडिया  का था"। हमने कहा- "ये रहा आपका पत्र, जो आपने एयर इंडिया को लिखा था कि बढ़ी हुयी संख्या का प्रपोजल भेजे"।

पटेल जी ने बात घुमाई - "हवाई यात्रियों की संख्या में तेजी से उछाल आया था, बढ़ी हुयी संख्या में हवाई जहाजों की आवश्यकता थी"। हमने कहा- " फ़िर एक बात समझ में नही आयी कि जब आपने इतने ज्यादा विमानों का आर्डर दे ही दिया था तो फ़िर निजी कंपंनियो को आपने क्यों जहाज चलाने छूट दी, अब उनके विमान और  एयर इंडिया के बढ़े हुये विमान मिल कर तो विमान अतिरिक्त हो गये कि नही और एयर इंडिया के विमान अब आधी कैपेसिटी मे उड़ रहे हैं, उसको तगड़ा नुकसान हो रहा है। पटेल जी ने नया तर्क दिया -"अगर हम एयर इंडिया के सामने कांपीटीशन नही रखते तो वह तो मनमाना किराया वसूलता देश के आम आदमी को नुकसान होता, अब देखिये कीमते वाजिब है कि नही"।

हमने कहा- "पटेल जी, क्या देश भक्त आदमी हो आप, मान गये याने पहले विमान खरीदे कि यात्रियों को कम न पड़े और फ़िर जब विमान आ गये तो आपने निजी कंपनियों को भी बुला लिया कि भले एयर इंडिया के प्लेन घाटे मे उड़ें,  लेकिन आम आदमी को किराया मंहगा न पड़े।  अब यह भी बता दो कि जिन विदेशी मार्गों मे एयर इंडिया को मुनाफ़ा हो रहा था जैसे गल्फ़ आदि उसे आपने विदेशी कंपनियों के साथ समझौता कर उनके लिये क्यों खुलवा दिया। पटेल जी बोले - किराया कम करवाने के लिये, आम आदमी के फ़ायदे के लिये ही हम काम करते हैं और एयर इंडिया को भी तो वहां छूट मिली"।

हमने कहा - "भारत के 25 एयरपोर्ट की अनुमती  के बदले उनके एक या दो एयरपोर्ट की अनुमति मिली। वाह मान गये क्या सौदा किया 25 दिये दो लिये और फ़ायदा हुआ किसको विदेशी एयर लाईन भारत की निजी एयर लाईन और आपके अनुसार आम जनता का। अब तीन के फ़ायदे के लिये तो एक एयर इंडिया नुकसान अनदेखा किया ही जा सकता है। बेचारे एयर इंडिया वाले, आपको पत्र लिखते रह गये पर आप हैं कि आम आदमी का हित करते रहे। भले उससे निजी एयर लाइन और विदेशी एयर लाईन को फ़ायदा हो गया"।

हमने फ़िर कहा- "अब यह भी बता  दो कि इंडियन एयर लाइन और एयर इंडिया का विलय  क्यों करा दिया"। पटेल जी बोले- "भाई बचत के लिये, दो एम डी के बदले एक, दो आफ़िस के बदले एक आफ़िस इत्यादि। अब यह लोग फ़ायदा नहीं उठा पाये तो इसमे मंत्री क्या करे"। हमने कहा- " पटेल जी फ़िर भारत सरकार के इतने सारे सचिव, पीआईबी जैसे संस्थान तो बेवकूफ़ हैं कि  इतनी सरल बात उनको समझ नही आयी खामखां विरोध करते रहे और कैग भी मूर्ख है कि आप के इस निर्णय को घातक बता रहा है"। पटेल जी बोले- "अपनी अपनी सोच हम क्या कहें"।

हमने कहा- "हम बताते हैं सुनिये, आप पर लगाया कैग का आरोप अक्षरशः सही है। आपने मंत्री पद संभालने के केवल दो महिने के अंदर इतनी बड़ी संख्या मे विमानो के खरीदे जाने की योजना बना ली थी और यह खरीद जरूरत के आधार पर नही आपकी श्रद्धा से की गयी आपके दबाव मे एयर इंडिया ने इसे औचित्य पूर्ण ठहराने के लिए उलजुलूल तर्क और विश्लेषण तैयार किये। ये विश्लेषण इस हद तक बेवकूफ़ाना है कि एमबीए के प्रथम वर्ष का विद्यार्थी भी यदि इसे प्रोजेक्ट के रूप मे सबमिट करता तो फ़ेल हो जाता। सारे संस्थान इस  विश्लेषण को किसी जादुई शक्ती के दबाव मे पास करते रहे। यह जादुयी शक्ति इतनी ताकतवर थी कि केंद्र के पास यह प्रपोजल पहुंचते ही केवल सात दिनो मे ग्रुप आफ़ मिनिस्टर्स से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय ने इसे हरी झंडी दिखा दी और एयर इंडिया के पास महज 350 करोड़ रूपया होने के बावजूद 60000 करोड़ की खरीद का आर्डर देकरअग्रिम का भुगतान भी हो गया, बात साफ़ है आप लोगो ने हजारो करोड़ घूस खायी है"।

तनातनी बढ़ती देख शर्मा जी नें दखल दिया-  "दवे जी आप खामखां गरम हो रहे हो अभी तो रिपोर्ट आयी है संसद में पीएसी जांच करेगी"। हमने कहा- "फ़िर उसकी रिपोर्ट आपके खिलाफ़ आयेगी तो आप बैठक मे हंगामा कर दोगे, अध्यक्ष बदल दोगे"। शर्मा जी बोले- "कोर्ट कचहरी भी है, आप चिंता न करे"। हमने कहा- "कैसे आरोप सिद्ध होगा, G.O.M की अध्यक्षता श्री चिदंबरंम जी कर रहे थे, उन्होने हरी झंडी दिखाई है। अब जांच एजेंसियो के मालिक तो वही हैं, क्या खाक जांच होगी मामले की। उसके भी उपर चले जाओ, आरोप लगा भी दोगे तो  आरोपी अदालत में बयान दे  देगा कि मैने जो किया G.O.M और प्रधानमंत्री की अनुमती से किया तो आरोप क्या खाक साबित होंगे "।

शर्मा जी ने लाचारी से कंधे उचकाये- "अब आपको संसद और न्यायपालिका मे ही भरोसा नही रह गया तो क्या किया जाये"। हमने हाथ जोड़े कहा -" भाई जितना पैसा खाना है, सीधे खा लिया करो।  खामखा पांच रूपये कमीशन के चक्कर मे देश का सौ रूपया बरबाद करते हो।  अब साठ हजार विमान खरीद मे हद से हद कितना मिला होगा पांच हजार करोड़, इतने आपने सीधे ले लिये होते तो पचपन हजार करोड़ तो देश के बच जाते। निजी एयर लाईनो ने अनुमती के लिये कितनी घूंस दी होगी हजार करोड़ सीधे हजार करोड़ ले लेते तो आज एयर इंडिया मुनाफ़े मे चलती यही बात विदेशी एयर लाईन और निजी कंपनियों को दी छूट पर भी लागू होती है।

अब साहब शर्मा जी ने तो कह दिया है कि प्रस्ताव तो लाजवाब है, हम राजी हैं। सो मेरी आपसे यानी आम जनता से गुजारिश है कि सत्ता रूढ़ पार्टियों को हर काम में देश की ओर से कुछ प्रतिशत कमीशन दे दिया जाय तो हमारे भारत वर्ष का हर साल खरबों खरब रूपया बचेगा।

 


अरूणेश सी दवे

लेखक  प्लायवुड के व्यवसाय मे संलग्न हैं । पर्यावरण और वन्यप्राणियों से बहुत लगाव है |
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