कहाँ गया बचपन गलियों में, गलियारों में आँगन में, द्वारों में खेतों में, खालियारों में खेला करता था बचपन ! मौज थी मस्ती थी ख़ुशी हर जगह बसती थी सबके चेहरे पर था भोलापन खेला करता था बचपन ! न जाने कैसा प्रहार हुआ विकास के नाम पर अत्याचार हुआ बचपन अब लाचार हुआ ...
बोलना अभी सीखा नहीं... शुरू हो गई पढाई चल पड़ी नम्बरों की लड़ाई अच्छे नम्बर नहीं लाएंगे घर पर डांट फिर खाएंगे खेल खिलोनो से हो गई दूरी पढना लिखना ही हो गई मजबूरी पार्क में खेलने नहीं जा पाएँगे वहां से गुंडे उठा ले जाएँगे ये कैसा हो रहा विकास बचपन का हो गया सत्यानाश ! कुछ तो कर लेते पढाई कुछ को करनी पड़ती भूख से लड़ाई दर दर भटक रहा हे बचपन चाट रहा है जूठन बचपन तेरी अजब कहानी नहीं बची तेरी कोई निशानी इस धरा पर न जाने क्या हो गया है सब का बचपन यहीं कहीं खो गया है Savita Kaushal
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