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इज़्तिरार PDF Print Write e-mail
Hindi Corner - Hindi kavita
Wednesday, 02 November 2011 08:27



एक उँगली उठ तो जाती है गैर के गिरेबाँ पर
बाकी चार के इशारे को भी क्या कभी देखा है

उसके दामन में कालिख तो पोत दी लेकिन
अपने स्याह हाथों को भी क्या कभी देखा है

खूब करते हो लानत मलामत अमीरों की
अपनी जेब झाँक कर भी क्या कभी देखा है


जमीं पे आ जाते हैं आसानी से टूटकर आँसू
किसी आँखो में सूखे हुए भी क्या कभी देखा है

तमाम उम्र ढूँढा किया काशी-ओ-काबा में उसे
किसी मासूम के आँखो में भी क्या कभी देखा है

Sanjay Mahapatra
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