अब भी मुझे याद आता है,वह युग 'ऐ जी'ओ जी' वाला पश्चिम की संस्कृती ने आकर,सब व्यवहार बदल ही डाला जब सर ढके पत्नियाँ घर में,पति का नाम नहीं लेती थी अजी सुनो पप्पू के पापा,या चूड़ी खनका देती थी कभी बुलाना हो जो पति को,कमरे की सांकल खटकाना कभी कोई आ जाये अचानक,शर्मा कर झट से हट जाना चंदा से मुखड़े को ढक कर,दिन भर घूंघट करके रहना कितना प्यारा ,मनभाता था,उनका 'ऐ जी'ओ जी'कहना ले लेने से नाम पति का,उमर पति की कम होती थी तब पति पत्नी के रिश्ते में,थोड़ी झिझक,शरम होती थी घर के बूढ़े बड़े बैठ कर,कर देते थे रिश्ता पक्का
पहली बार सुहागरात में,मुंह दिखता था,पति पत्नी का कैसा होगा जीवन साथी,मन में कितना 'थ्रिल 'होता था मुंह दिखाई से मन रोमांचित,प्रथम बार जब मिल होता था इस युग में,शादी से पहले,मिलना जुलना अब होता है होती रहती डेटिंग वेटिंग,पिक्चर विक्चर सब होता है हनीमून हिल स्टेशन पर,घूंघट,मुंह दिखाई सब गायब जींस और टी शर्ट पहन कर,नव दम्पति घूमा करते अब एक दूजे को ,प्रथम नाम से ,पति पत्नी है अब पुकारते गया ज़माना,'सुनते हो जी',का पुकारना बड़े प्यार से लेकर नाम बुलाने का तो, होता है अधिकार सभी का पर 'ऐ जी'ओ जी'कहने का,हक़ था केवल पति पत्नी का रहन सहन सब बदल गया है,इस युग का है चलन निराला अब भी मुझे याद आता है,वह युग 'ऐ जी'ओ जी' वाला