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Hindi Corner -
Hindi kavita
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Sunday, 06 November 2011 09:46 |
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 छल-छल कल-कल करता जल जो गति नीचे कर बहता जाता, ऐसे ही यह मन मानव का, जल सम नीचे ही ले जाता !
सर-सर, फर-फर करे अनल ज्यों ऊपर की ही दौड़ लगाती, सजग हुई आत्मा अपनी उच्च लोक में ही ले जाती !
जल, अग्नि के निकट हुआ जब वाष्प रूप में बुद्धि प्रकटी, जब तक साथ आत्मा का है गति ऊपर, फिर नीचे आती !
ऊपर नीचे, नीचे ऊपर मन ही मानव को भटकाता, कभी बूंद बन लगे बरसने कभी मेघ बन नभ पर छाता !
अग्नि सम यदि स्वयं को जाने गति ऊपर की ही होगी उसकी, पावन है पावन कर सकती अग्नि में है अनुपम शक्ति !
भटका जल पोखर हो बैठा कभी किसी सँग मिल के मैला, जिसका सँग हो वैसे बनता जल है कोई बिगड़ा छैला !
अग्नि पारस सी पावन है माना प्यास बुझाता है जल, अग्नि के सम्पर्क में आ ही शुद्ध हुआ करता है जल !
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