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मुझे जीना सिखाती हो तुम ... PDF Print Write e-mail
Hindi Corner - Hindi kavita
Sunday, 06 November 2011 11:02


मन क्यूँ उदास हो जाता है,
प्रेम के फेर में उलझ जाता है
मेरी असफलता पर तुम क्यूँ
उदास हो घबरा जाती हो
फिर खुश होकर मेरी सफलता पर
शांत हो जाती हो
जुदाई की कल्पना से ही तुम
मुझसे लिपट जाती हो
बहती है नीर अंखियन से पर
देख मुझे मुस्काती हो
क्या उलझन है ह्रदय में तुम्हारी !
क्यूँ नही बतलाती हो


ना समझी पर मेरे तुम
झूठा गुस्सा क्यूँ जताती हो
फिर क्यूँ मेरी सभी गलतियों को
भूलकर मुझे अपनाती हो
कुछ भी हो तुम्हे समझ जाता हूँ
और मुझे समझ जाती हो तुम
इसी तरह हर लम्हा जिन्दगी का
मुझे जीना सिखाती हो तुम

Mukesh Goswami

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