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रेशम के फाहों सी नर्म नर्म धूप PDF Print Write e-mail
Hindi Corner - Hindi kavita
Tuesday, 08 November 2011 05:36


पूरब झरोखे से झांक रही
धूप की गिलहरी
उतरी बिछौने पर
जाने कब बरामदे से
उड़न छू हो गयी...
धूप वह सुनहरी !

सर्दियों की शहजादी
भा गयी हर दिल को
पकड़ में न आये
चाहे लाख हम मनाएं
देर से जगती है
धूप सुकुमारी !


(२)
तन मन को दे तपन
अंतर सहला गयी
महकाती धूप
कलियाँ जो सोयीं थीं
कोहरे की चादर में
लिपटीं जो खोयीं थीं
जाने किन स्वप्नों में
जागीं, जब छू गयी
गुनगुनी सी धूप !

मोती जो अम्बर से
छलके थे ओस बन
चमचम खिल गा उठे
मौन गीत झूम
सँग ले उड़ा गयी
अलसाई धूप
नन्हें से गालों पर
फूल दो खिला गयी
मनभाई धूप !


Anita Nihalini
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