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प्रेम काव्य - दैवीय रूप PDF Print Write e-mail
Hindi Corner - Hindi kavita
Friday, 11 November 2011 00:00


नयन भटके, नयन अटके,
देख एक सुंदर स्वरूप।
चित उछल उछल करता हलचल,
सम्मुख है अभिराम रूप॥

अद्भुत सुंदर विकसित तन,
लज्जित अरु चंचल चितवन।
उज्ज्वल धवल वस्त्र शुशोभित,
बस लगे कोई दैवीय रूप॥


मैं ठहरा एक पुजारी उसका,
पूजन करता छांव धूप।
गिने चुने चंचल कदमों से,
सम्मोहित करता रंग रूप॥

मदभरे नयन पूर्ण यौवन,
आकर्षित करते प्रत्येक मन।
सुरचित त्रुटिहीन सत्य सौंदर्य,
स्वयं प्रदर्शित मूर्ति रूप॥

Neeraj Kumar Dwivedi
Neeraj's Blog

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