माँ पर कविता - माँ कुछ दिन तू और न जाती Print
Ojaswi Kaushal
Hindi Corner - Hindi kavita
Tuesday, 08 November 2011 05:56



माँ कुछ दिन तू और न जाती,
मैं ही नहीं बहू भी कहती,
कहते सारे पोते नाती।
माँ कुछ दिन तू और न जाती..

हरिद्वार तुझको ले जाता,
गंगा में स्नान कराता ।
कुंभ और तीरथ नहलाता,
कैला माँ की जात कराता ।
धीरे धीरे पांव दबाता,
तू जब भी थक कर सो जाती। माँ कुछ...

रोज़ सवेरे मुझे जगाना,
बैठ खाट पर भजन सुनाना ।
राम कृष्ण के अनुपम किस्से,
तेरी दिनचर्या के हिस्से।
कितना अच्छा लगता था जब,
पूजा के तू कमल बनाती।  माँ कुछ ....

सुबह देर तक सोता रहता,
घुटता मन में रोता रहता ।
बच्चे तेरी बातें करते,
तब आंखों में आंसू झरते।
हाथ मेरे माथे पर रख कर,
माँ तू अब क्यों न सहलाती। माँ कुछ....


कमरे का वो सूना कोना,
चलना,फ़िरना,खाना,सोना।
रोज़ सुबह ठाकुर नहलाना,
बच्चों का तुझको टहलाना।
जिसको तू देती थी रोटी,
गैया आकर रोज़ रंभाती।  माँ कुछ....


अब जब से तू चली गई है,
मुरझा मन की कली गई है।
थी ममत्व की सुन्दर मूरत,
तेरी वो भोली सी सूरत।
द्रूढ निश्चय और वज्र इरादे,
मन गुलाब की जैसे पाती।
माँ कुछ दिन तू और न जाती.

आर.सी.शर्मा “आरसी”

क्या आप भी कवि हैं ?? अपनी रचनाएँ इ-मेल करें " mypost@catchmypost.com" पर  |