आखिर क्यों Print
Anita Nihalani
Hindi Corner - Hindi kavita
Sunday, 13 November 2011 00:00


चहकते पंछी की तरह हम आकाश को
अपनी बाँहों में चाहते भरना
हवा के तेज झोंके से ढह गए
रेत के घरौंदे की मानिंद
टूट जाते ऊंचाई के परिमाण
जाते साथ छोड़ आस्था के आयाम
होता नहीं विश्वास ताश का महल
न ही पुल कच्चे धागे का
किन्तु चाहे जो होना स्वयं विश्वास...
चाहे जो आकाश... चाहे जो सागर ...


उगते सूरज को देख देख मुस्काते हम
क्यों रह जाते हैं एकाकी
लख फूलों को टहनियों से झूलते
हजार आँखों से देखते दुनिया
हरि घास की मखमली चादर पर
साथ छोड़ देती क्यों मुस्कान अचानक
दिशाएं क्यों पूछती सी लगती सवाल
हम नासमझ बच्चे से चुपचाप
खड़े रह जाते...
सहने कोई तीखा दंश अध्यापक का, ज्यों बालक

देख नीलवर्णी निर्मल वितान को  
चुप हो जाते गाँव के गाँव
टेरते चुप आवाजों में वे गायों को
चुप हो जाता मन भी किसे टेरता
शीतल माटी पर पांव टिकाए
खड़े रहना क्यों भला लगता मन को...
चहकते पंछी की तरह चाहते हम आकाश को....

Anita Nihalini

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