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तू उस पार दिव्य आलोकित PDF Print Write e-mail
Hindi Corner - Hindi kavita
Sunday, 20 November 2011 19:11


जन्म है दुःख, दुःख है मरण
जरा है दुःख, दुःख है क्षरण
जो थोड़ा सा भी सुख मिलता
खो जाता, हो जाता झरण !

भीतर कोई दर्द है गहरा
एक चुभन सी टीस उठाती,
रह-रह कर लघु लहर कोई
भीतर कोई पीर जगाती !


जीवन कितने भेद छिपाए
रोज उघाड़े घाव अदेखे,
जाने कितना बोझ उठाना
जाने क्या लिखा है लेखे !

अहम् की दीवार खड़ी है
मेरे-तेरे मध्य, ओ प्रियतम !
बाधा यह इक मात्र बड़ी है
मिलन न होता दूर हैं हम-तुम !

तू उस पार दिव्य आलोकित

 

सदा निमंत्रण भेज रहा है,
घन तमिस्र के सूनेपन में
मन ही जिसे सहेज रहा है !   

कैसा सुंदर पल होगा वह
यह दीवार भी ढह जायेगी,
युगों-युगों से जो मन में है
पीड़ा विरह की बह जायेगी !

Anita Nihalini

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