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पार वह उतर गया PDF Print Write e-mail
Hindi Corner - Hindi kavita
Tuesday, 22 November 2011 08:02

पार वह उतर गया

दर्पण सा मन हुआ
गगन भीतर झर गया

सहज सिद्ध प्रेम यहाँ
होश भीतर भर गया

हो सजग जो भी तिरा
पार वह उतर गया


पाप-पुण्य खो गए
वर्तमान हर गया

दिख रहा भ्रम ही है
भाव कोई भर गया

रिक्तता ही जग में है
व्यर्थ मन डर गया

मन जुड़ा जब झूठ से
सत्य फिर गुजर गया

पंचभूतों का प्रपंच
बोध चकित कर गया

सत्य है बहुमुखी
नव आयाम धर गया

मस्त हुई आत्मा
प्रीत कोई कर गया

डूबा जो वह तर गया
बच रहा वह मर गया

Anita Nihalini

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पार वह उतर गया

 

 

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