एक सुबह की धड़कन बोली, कब तक प्रश्न करोगे तुम भी? हमने सब कुछ कह डाला है, हमने सब कुछ लिख डाला है, कब तक अनजान बनोगे तुम भी?
उत्तर सारे सम्मुख रहते हैं, लोग उन्हें अनदेखा करते हैं,
ज्ञान स्वयं में पूर्ण रहा है, बालक भी सम्पूर्ण रहा है, असीम प्रकृति के नियमों का, कब तक अपमान करोगे तुम भी?
कब तक प्रकृति तुम्हे दुलराएगी? जीवन के सच्चे अर्थ बताएगी? कब तक यूँ क्षमा करेगी तुमको? बचा धर्म एक बस मानवता है, कब तक बदनाम करोगे तुम भी?