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Hindi Corner -
Hindi kavita
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Wednesday, 23 November 2011 08:23 |
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 जीवन इक लय में बढ़ता है भोर जगे साँझ सो जाये, कभी हिलोर कभी पीर दे जाने क्या हमको समझाये !
नए नए आविष्कारों से एक ओर यह सरल हो रहा, प्रतिस्पर्धायें बढ़ती जातीं जीवन दिन-दिन जटिल हो रहा !
निज पथ का राही ही तो है अपनी मति गति से चलता है, फिर भी क्यों मानव का उर सहयात्री से भी डरता है !
मित्रों में ही शत्रु खोजता प्रेम के पीछे घृणा छिपाए, दोहरापन ही तोड़ रहा है दीवाना मन समझ न पाए !
मन के पार उजाला बिखरा नजर उठाकर भी न देखे, स्वयं का ही विस्तार हुआ है स्वयं ही सारे लिखे हैं लेखे !
Anita Nihalini
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