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Hindi Corner -
Hindi kavita
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Friday, 25 November 2011 09:39 |
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 स्वर्ण कलश छिपा है सुंदर तेरे भीतर मेरे भीतर, गहरा-गहरा खोदें मिलकर तेरे भीतर मेरे भीतर !
दिन भर इधर-उधर हम खटते नींद में उसी शरण में जाते, शक्तिपुंज वह सुख का सागर फिर ताजे हो वापस आते !
होश जगे यदि उसको पाएँ यह प्यास भी वही जगाए, सुना बहुत है उसके बारे वह ही अपनी लगन लगाये !
इस मन में हैं छिद्र हजारों झोली भर-भर वह देता है, श्वासें जो भीतर चलती हैं उससे हैं यह दिल कहता है !
अग्नि के इस महापुन्ज में देवशक्तियां छुपी हैं कण-कण, बर्फीली चट्टानों में भी मिट्टी के कण-कण में जीवन !
जो भी कलुष कटुता भर ली थी उसके नाम की धारा धो दे, जो अभाव भी भीतर काटे अनुपम धन भर उसको खो दें !
Anita Nihalini
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