अपने आप से ही हू मै अनजानी, आज तक न जान पाई क्या हु, कौन हु और क्युं हू क्या है मेरा वजुद कोइ अस्तित्व नही है मेरा फिर भी जिए जा रही हू अपने जख्मो को सिए जा रही हू क्या मै भी कभी किसी कि मन्जिल बन सकुगी या कोइ होगा मेरा हमसफ़र या यु ही बेमकस्द भटकती रहुगी
मेरा इन्तजार होगा पुरा कभी या यु ही सदा मै तरसती रहूंगी
Rajlaxmi Shukla
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