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बासंती सौगात PDF Print Write e-mail
Hindi Corner - Hindi kavita
Saturday, 03 March 2012 19:45

महक की पतवार

हवाओं का सागर

किरणों की तरणी में

देशाटन करते

सूरज भूल जाता है

अस्त होना

चाँद ढलना

घूँघट हटा सुबह

चुनरी फहरा साँझ

और  बेशर्मी से पसरी रात

करती नशीली बात

बिखेरती रहती हें

बासंती सौगात

 

आँखों को फड़काती

होठों को थरथराती

उँगलियों को कँपाती

न जाने कितने

मादक आगोश

जगाती

और ढीठ की तरह

सारे राज़

खुशबूओं को बताती!

 

Arun Sharma

 

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