Hindi Poem on 26/11 Mumbai attack Print
Ojaswi Kaushal
Hindi Corner - Hindi kavita
Saturday, 26 November 2011 07:55

लो फिर आ गयी छब्बीस बटा ग्यारह..........अब तो कुछ शर्म कर लो

26 / 11 मुंबई हमले पर कविता

लो फिर आ गयी
छब्बीस बटा ग्यारह
एक दिन का शोर शराबा
फिर वो ही मंजर पुराना
सब कुछ भुला देना
चादर तान के सो जाना
क्या फर्क पड़ता है
मासूमों की जान गयी
क्या फर्क पड़ता है
जिनके घर ना
अब तक जले चूल्हे
क्या फर्क पड़ता है
जिसकी बेटी रही अनब्याही
क्या फर्क पड़ता है
दूधमुंहे से छिन गयी ममता प्यारी
क्या फर्क पड़ता है
माँ की आँख का ना सूखा पानी
क्या फर्क पड़ता है
जिसके घर ना मनी दिवाली
क्या फर्क पड़ता है
सूनी माँग में ना भरी लाली
क्या फर्क पड़ता है
अपाहिज के जीवन को मोहताज हुआ
क्या फर्क पड़ता है
जब स्कूल जाने की उम्र में
थाम ली हो घर की चाबी
दो वक्त की रोटी के जुगाड़ में
बेच दी हों किताबें सारी
पेट की आग बुझाने को
ज़िन्दगी से लड़ जाने को
बिटिया ने हो घर की
बागडोर संभाली
किसी को फर्क ना
तब पड़ना था
ना अब पड़ना है
ये तो सिर्फ तारीख की
भेंट चढ़ता कड़वा सच है
जिसे खून का घूँट
समझ कर पीना है
जहाँ अँधियारा
उम्र भर को ठहर गया है
जहाँ ना उस दिन से
कोई भोर हुई
किसी को ना कोई फर्क पड़ना है
दुनिया के लिए तो
सिर्फ एक तारीख है
एक दिन की कवायद है
राजनेताओं के लिए
श्रद्धांजलि दे कर्त्तव्य की
इतिश्री कर ली जाती है
उस बाप की सूखी आँखों में ठहरा
खामोश मंजर आज भी ज़िन्दा है
जब बेटे को कंधे पर उठाया था
उसका कन्धा तो उस दिन
और भी झुक आया था
बदल जाएगी तारीख
बदल जायेंगे मंजर
पर बूढी आँखों में ठहर गया है पतझड़
अब तो कुछ शर्म कर लो
ओ नेताओं ! मत उलझाओ
कानूनी ताने बानों में
मत फेंको कानूनी दांव पेंचों को
दे दो कसाब को अब तो फाँसी
शायद आ जाये
उस बूढ़े के होठों पर भी हँसी
मरने से पहले मिल जाये उसे भी शांति
माँ की आँखों का सूख जाए शायद पानी
या फिर उसकी बेवा की सूनी माँग में
सूने जीवन में , सूनी आँखों में
आ जाए कुछ तो लाली
मत बनाओ इसे सिर्फ
नमन करने की तारीख
अब तो कुछ शर्म कर लो
अब तो कुछ शर्म कर लो.................

Vandana Gupta

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