तालियों की आवाज़ में देव प्रकाश जी की रुंधी हुई आवाज़ को शायद किसी ने महसूस नहीं किया !चश्मा थोडा सा ऊपर कर वो अपनी आँखों के कोरो को रुमाल से पोंछ रहे थे !उम्र के आखिरी पड़ाव पर आकर उन्हें एहसास हुआ कि जीवन में कुछ सीखना हो तो उम्र मायने नहीं रखती न ही उम्र बंधन है !बस कुछ भी पाना हो और अपनी मंजिल पर पहुंचना हो तो बस एक जज्बा ही होना चाहिए! और ये एहसास उनकी अपनी बहू स्नेहा ने दिलाया जो स्टेज के पीछे खड़ी उन्हें हाथ हिला कर अपनी ख़ुशी से भीगी आँखों से मौन बधाई दे रही थी ! देव प्रकाश जी गदगद ह्रदय से दिल से बहू को आशीष दे रहे थे ! आज उन्हें अनाथ बच्चों को पढाने और उन्हें हर संभव सहायता करने के लिए सम्मानित किया जा रहा था !उनकी पत्नी को भी,गरीब लडकियो को सिलाई कढाई सिखाने के लिए सम्मानित किया जा रहा था ! सविता देवी खुद कुछ ज्यादा पढ़ी नहीं थी पर जितना आता था ,जितना उन्होंने अपने परिवार को अपनी समझ और सूझबूझ से संभाला, वही अनुभव उन गरीब लड़कियों के जीवन को संवारने में अर्पित कर रह थीं! देव प्रकाश जी की डबडबआई आँखों में वो पल घूम गए जब इसी बहू स्नेहा को उन्होंने स्वीकार ही नहीं किया था !बहुत खरी खोटी सुनाई अपने मंझले बेटे को जो प्रेम विवाह कर अपनी विजातीय पत्नी को सीधा घर ले आया था !मालूम था उसे कि पूछने पर उसे स्वीकृति नहीं मिलेगी इसलिए हिम्मत कहो या महेश के प्रेम की इंतहा कि स्नेहा को ब्याह कर परिवार वालो के सामने खड़ा कर दिया बस!बहुत आगा बबूला हुए थे उस दिन देव प्रकाश जी !

